
सवाईमाधोपुर। मोबाइल फोन पर लगातार रील्स देखने का चलन अब मनोरंजन की सीमा पार कर खतरनाक लत में बदल चुका है। यह आदत बच्चों, किशोरों और युवाओं के मानसिक संतुलन, शारीरिक स्वास्थ्य और सामाजिक रिश्तों पर गहरा प्रहार कर रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि स्क्रीन की गिरफ्त में रहने से आंखों की रोशनी कमजोर हो रही है, तनाव और सिरदर्द बढ़ रहे हैं, और बच्चों की दिनचर्या पूरी तरह बदल रही है। अश्लीलता, आक्रामक व्यवहार और अपराध जैसी प्रवृत्तियां भी इसी लत से पोषित हो रही है। यह केवल तकनीकी सुविधा नहीं, बल्कि समाज के भविष्य पर मंडराता गंभीर खतरा बन चुका है।
रील्स की लत बच्चों और युवाओं की सोचने-समझने की क्षमता कमजोर कर रही है। पढ़ाई से दूरी बढ़ रही है। मनोचिकित्सकों का कहना है कि यह लत धीरे धीरे तनाव, चिड़चिड़ापन और डिप्रेशन को जन्म दे रही है। रिश्तों में संवाद कम हो रहा है और सामाजिक दूरी बढ़ रही है। मोबाइल स्क्रीन पर लगातार टिके रहने से आंखों की रोशनी प्रभावित हो रही है। सिरदर्द नींद की समस्या आम हो गई है। शारीरिक गतिविधियां घटने से मोटापा बढ़ रहा है। खेल और आउटडोर गतिविधियों से दूर बच्चों का शारीरिक विकास रुक रहा है।
रील्स देखने की लत का दिमाग पर गहरा असर पड़ रहा है। इससे आंखों की रोशनी कम होना, सिरदर्द और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं बढ़ रही है। बच्चे पढ़ाई और सामाजिक गतिविधियों से दूर हो रहे है। मोबाइल पर लगातार समय बिताने से शारीरिक गतिविधियां भी कम हो जाती है। जिला अस्पताल में ऐसे प्रतिदिन दो केस आ रहे है, जिन पर रील्स की लत का गहरा मानसिक प्रभाव दिखाई दे रहा है।
-डॉ. गौरव चंद्रवंशी, मनोचिकित्सक, जनरल हॉस्पिटल सवाई माधोपुर
रील्स की लत केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक समस्या भी बन रही है। परिवारों में संवाद कम हो रहा है। बच्चों और किशोरों का समय मोबाइल पर बीतने से रिश्तों में दूरी और नकारात्मकता बढ़ रही है। अश्लीलता और आक्रामक व्यवहार जैसी प्रवृत्तियां भी इसी लत से पोषित हो रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल सरकारी सख्ती से समस्या का समाधान संभव नहीं है। अभिभावकों, शिक्षकों और सामाजिक संगठनों को मिलकर बच्चों को सकारात्मक दिशा देनी होगी। परिवारों को बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखनी चाहिए और उन्हें पढ़ाई, खेल और रचनात्मक गतिविधियों के लिए प्रेरित करना चाहिए।
सवाईमाधोपुर डॉ. मनीष शर्मा (शिशु एवं बाल राग विशेषज्ञ) के अनुसार मोबाइल अब बच्चों की जिंदगी का स्थायी हिस्सा बन चुका है। लेकिन इसका अत्यधिक उपयोग उनके मानसिक संतुलन, शारीरिक विकास और सामाजिक रिश्तों पर गहरा नकारात्मक असर डाल रहा है। यह लत धीरे-धीरे बच्चों को तनाव, चिड़चिड़ापन और डिप्रेशन की ओर धकेल रही है। बचाव के लिए जरूरी है कि बच्चों के मोबाइल उपयोग का समय तय किया जाए। उन्हें आउटडोर गेम्स, किताबों और रचनात्मक गतिविधियों की ओर प्रेरित किया जाए।
खाने और पढ़ाई के समय मोबाइल से दूरी बनाई जाए। बच्चों से दोस्त बनकर बातचीत की जाए और उनकी ऑनलाइन गतिविधियों को समझा जाए। माता? पिता को खुद भी मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से बचना होगा। जब बड़े ही मोबाइल की गिरफ्त में रहेंगे तो बच्चों को रोकना असंभव होगा। परिवार का अनुशासन और सकारात्मक माहौल ही बच्चों को इस खतरनाक लत से बचा सकता है।