सीकर

जज्बे को सलाम : दुश्मनों के नापाक इरादों को कर दिया था ढेर, पढ़िए सीकर के जवानों के ऐसे किस्से, जो रग-रग में भर देंगे जोश

राजस्थान की धरा को वीरों की भूमि यूं ही नहीं कहा जाता। राजस्थान का इतिहास वीरता और पराक्रम के असंख्य किस्से खुद में समेटे हुए है।

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Dec 02, 2024

अनुराग शर्मा
Sikar News: सरहदों पर जब जवान अपनी जान दांव पर रखते हैं तो हम घर में सुकून की सांस लेते हैं। उन जवानों को दुश्मनों की भारी गोलाबारी के बीच रहना पड़े या भीषण गर्मी की तपन या बर्फीले तूफानों की कंपन सहना पड़े, वे देश को दिल व जान को हथैली पर रखे हरदम मुस्तैद रहते हैं। देश की आन बान शान के लिए मां-बाप का दुलार, बच्चों की मासूम पुकार, पत्नी को भी भूल जाते हैं। जज्बे को जज्बातों से आगे रख दुश्मनों में खौफ पैदा रखने वाले कस्बे के राजपुरा, भीराणा, भगतपुरा, स्वामी व बोसाना के वीर सपूतों पर पेश रिपोर्ट…

जगनसिंह ने 40 किमी अंदर घुसकर किया था ऑपरेशन

निकटवर्ती भगतपुरा गांव के निवासी सेवानिवृत्त इंस्पेक्टर जगन सिंह शेखावत ने 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए जंग में हिस्सा लिया था। जगन सिंह ने बताया कि वे 19 साल की उम्र में बीएसएफ में भर्ती हुए थे। पहली पोस्टिंग बाड़मेर होने के बाद में 1971 के युद्ध में उनको त्रिपुरा भेजा गया। इस युद्ध के दौरान उन्होंने दुश्मन देश पाकिस्तान के 40 किलोमीटर अंदर जाकर हवाई पट्टी को तोड़ा था। उन्होंने बताया कि अगरतला एयरपोर्ट पर वो तैनात थे।

इसी दौरान खबर आई कि दुश्मन देश के कमांडो रात को एक बड़े ऑपरेशन को अंजाम देने की फिराक में है। पूरी रात बारिश हो रही थी। इसी बीच वहां पर वो तैनात हो गए और जैसे ही रात में दुश्मन देश के कमांडो आए तो उनके ऑपरेशन को फेल कर दिया गया। जगन सिंह ने बताया कि सेनमती की सेवा के दौरान उनके सामने एक खौफनाक मंजर सामने घटित हुआ था। उन्होंने बताया कि वह एक टास्क को पूरा करके वापस लौट रहे थे। इस दौरान दुश्मनों की तरफ से फायर आना शुरू हो गया पीछे से सपोर्ट कर रहा इसका एक साथी उसे फायर का जवाब दे रहा था।

इसी दौरान उनके पेट पर फायर हो गया, जिसके चलते पूरा पेट फट गया और आतें बाहर आ गईं। बावजूद इसके जवान दुश्मनों की जवाबी कार्रवाई में फायरिंग करता रहा पीछे से फायरिंग की जानकारी मिलते ही सेक्शन कमांडर को एक जवान के पीछे छूटने की जानकारी मिली तो उन्होंने तुरंत प्रभाव से यह बोलते हुए बचाने के लिए दौड़ पड़े कि मेरा जवान है मरूंगा तो मैं मरूंगा उसको बचाने की जिम्मेदारी मेरी है। सेक्शन कमांडर जख्मी जवान को छाती से बांधकर निकाल कर ले आए। इसके बाद उन दोनों को राष्ट्रपति पुरस्कार से समानित किया गया।

गोविंद राम ने लड़ा था 1965 और 1971 का युद्ध

लोसल के पास के गांव बोसाणा निवासी सेवानिवृत असिस्टेंट कमांडेंट गोविंदराम सेन ने भारत-पाकिस्तान के बीच हुआ 1965 और 1971 का युद्ध लड़ा था। गोविंद राम ने बताया कि वें 18 साल की उम्र में ही आरएसी में शामिल हो गए थे। 1 दिसंबर 1965 को पाकिस्तान व बांग्लादेश सीमा सुरक्षा को लेकर बीएसएफ की स्थापना की गई थी। इसके बाद उनकी बटालियन को बीएसएफ की 15 बीएसएफ बटालियन में शामिल कर दिया गया था। इसी दौरान पाकिस्तान के सीजफायर करने के बाद युद्ध छिड़ गया था।

इस दौरान बाड़मेर सरूप का तला में उनकी पोस्ट के पास गोलीबारी लगातार चल रही थी, लेकिन इससे भी भीषण जंग उनके पास की ही पोस्ट पर हुई थी। जहां पर दोनों देशों की सेनाओं के बीच जबरदस्त युद्ध हुआ। इस दौरान दोनों तरफ के करीब 500 से 700 जवान शहीद हो गए। इसी बीच गडरा रोड उनके पास की एक कंपनी को पाकिस्तान सेना ने बंधक बना लिया था। इसके बाद भारत और पाकिस्तान की सरकार के बीच समझौता होने के बाद कंपनी को छोड़ा गया। इसके बाद 1971 का युद्ध हुआ, जिसमें उनकी यूनिट ने करीब 8 से 10 किलोमीटर पाकिस्तान में जाकर हमला किया और उनको भागने के लिए मजबूर कर दिया था।

इसके बाद 1993 से 1995 तक श्रीनगर के जामिया मस्जिद कांख मोहल्ला में उनकी पोस्टिंग हुई। गोविंदराम ने बताया कि यहां पर सबसे ज्यादा उग्रवाद फैला हुआ था। उन्हें इसका भी अंदाजा नहीं था कि किसी भी समय उन पर हमला हो सकता है। एक समय ऐसा भी आया कि लगातार उनकी उग्रवादियों से मुठभेड़ भी हुई। कई बार पेट्रोलिंग के समय उग्रवादियों की ओर से ऊपर हमला कर दिया जाता था। उन्होंने बताया कि श्रीनगर में सेवा के देते हुए कई बार उन्होंने मौत का सामना किया। कई बार आतंकवादियों की ओर से चलाई गई गोलियां उनके बाजू को छूकर निकल गई थी। एक बार तो रास्ते में चलते समय आतंकवादियों ने उन पर अचानक हमला कर दिया था तो इस बीच गोली उनके दोनों पैरों के बीच से निकलते हुए आगे निकल गई।

हाथी सिंह व उनकी बटालियन ने दुश्मन के 45 टैंक किए थे ध्वस्त

लोसल के निकट के गांव बोसाणा निवासी लैस नायक हाथी सिंह ने 1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए हिस्सा लिया था। हाथी सिंह ने बताया कि 20 साल की उम्र में ही वें बीएसएफ में शामिल हो गए थे। इसके बाद 1971 का युद्ध शुरू हो गया। इस दौरान जैसलमेर के लोंगेवाला में उन्होंने दुश्मन सेवा के अपनी टीम और वायु सेवा के साथ मिलकर 45 टैंक ध्वस्त कर दिए थे। उन्होंने बताया कि पूरी रात्रि तक अंधेरी रात में युद्ध चला रहा। दोनों ओर से लगातार गोलीबारी हो रही थी।

इस बीच कई सैनिक रास्ता भी भूल गए थे और भारतीय टैंक युद्ध स्थल तक नहीं पहुंच पाए थे। बावजूद इसके युद्ध स्थल पर लगातार डटे रहे और दुश्मन को आत्म समर्पण के लिए मजबूर कर दिया। युद्ध के दौरान कई उनके साथी सैनिक शहीद हो गए थे। उन्होंने बताया कि उनके साथी सैनिक लगातार हो रही गोलीबारी के बीच भी दुश्मन को जवाब दे रहे थे। उनके साथ रहे कई सैनिक दुश्मन सेना की गोली लगने से शहीद हो गए थे। इस जंग में सबसे ज्यादा नुकसान पाकिस्तान सेना को हुआ। इस जंग के दौरान उन्होंने मौत को अपने सामने से गुजरते हुए कई बार देखा।

1971 में जवान प्रहलाद सिंह को जब छूकर निकल गई थी मौत

बीएसएफ में सेवानिवृत्त प्रहलाद सिंह ने बताया कि 1971 के भारत पाक की यादें आज भी ताजा है। जैसलमेर के तनोट में पाकिस्तान के साथ युद्ध के दौरान हुए पाकिस्तान के हवाई हमले में चारों ओर से गिरे हुए थे। सामने से भारी गोलाबारी हो रही थी। बावजूद इसके भारत की सेना ने दुश्मन सेना को मुंहतोड़ जवाब देते हुए भागने पर मजबूर कर दिया। प्रहलाद सिंह ने बताया कि पाकिस्तानी सैनिक युद्ध के दौरान अपने टैंक हथियार सहित बॉर्डर पर छोड़कर भागे। इसके बाद उन्होंने बांग्लादेश बॉर्डर पर पाकिस्तान सेना से लोहा लिया। इस दौरान दुश्मन सेना की एक गोली उनके कान से बिल्कुल नजदीक से निकली। इसमें वह बाल बाल बचे, लेकिन गोलियों की परवाह किए बिना आगे बढ़ते रहे और पाकिस्तान सेना को धूल चटाई।

सामी के पृथ्वी सिंह ने 11 आतंकियों को किया था ढेर

लोसल के निकट के गांव स्वामी निवासी सेवानिवृत्त हवलदार पृथ्वी सिंह ने 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई जंग में हिस्सा लिया था। इसी युद्ध के बाद बांग्लादेश भी अस्तित्व में आया था। पृथ्वी सिंह ने बताया कि 20 साल की उम्र में ही बीएसएफ में भर्ती हो गए थे। इस दौरान युद्ध हो गया। इसके बाद श्रीनगर के बारामूला के सिंह पूरा पोस्टिंग के दौरान आतंकियों से उनका सामना हो गया था। आतंकियों से हुई मुठभेड़ में उनकी टुकड़ी ने 11 आतंकियों को ढेर कर दिया था।

इस दौरान एक घर की छत पर छिपे आतंकी ने उनकी टुकड़ी पर हमला कर दिया था। इस दौरान टुकड़ी में शामिल इंस्पेक्टर को गोली लग गई थी। जवाबी कार्रवाई में उनके जवानों ने आतंकी को भी मार गिराया था। पृथ्वी सिंह ने बताया कि सेना में दी सेवाओं के दौरान सबसे ज्यादा भयानक मंजर उन्होंने श्रीनगर में ही देखा था। 1995 से 1998 के दौरान श्रीनगर के बारामूला में उग्रवादियों का हर जगह पर खौफ था और उनका निशाना केवल भारतीय फौजी रहते थे। इसलिए उन्हें अपने हेड क्वार्टर से बाहर निकलने में भी बड़ी परेशानियां होती थी। जब बाहर निकाल कर जाते थे तो उन्हें हर समय यह डर रहता था कि किसी भी घर से उनके ऊपर हमला हो सकता है।

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