
प्याज। फाइल फोटो- पत्रिका
सीकर। अलवर के बाद उत्पादन में दूसरे पायदान पर शामिल सीकर जिले में प्याज की एक भी प्रोसेसिंग इकाई नहीं है, जिसका खामियाजा प्याज उत्पादक किसानों को भुगतना पड़ता है। प्याज की खेती के बाद बंपर उत्पादन होने के बावजूद यहां के किसानों को अपनी उपज औने-पौने दामों पर बेचने को मजबूर होना पड़ता है। इससे जहां सीकर के किसानों को प्याज सस्ते भाव में बेचना पड़ता है, वहीं दूसरे राज्य उसी प्याज को महंगे दामों पर बाजार में बेचकर बड़ा मुनाफा कमा लेते हैं।
व्यापारियों के अनुसार यदि फूड प्रोसेसिंग नीति के तहत सीकर को विशेष पैकेज दिया जाए, तो यह प्याज उत्पादों का हब बन सकता है। इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि किसानों और व्यापारियों के पलायन पर भी रोक लगेगी। योजना के तहत प्रोसेसिंग इकाइयां स्थापित हों तो यहां के प्याज से प्याज पाउडर, फ्लेक्स, पेस्ट जैसे मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। कई बार उत्पादन इतना अधिक हो जाता है कि किसानों का प्याज बोरियों में ही खराब हो जाता है और मजबूरी में उसे फेंकने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
प्याज उत्पादन: करीब साढ़े चार लाख मीट्रिक टन प्रति वर्ष
बाहर भेजी जाने वाली मात्रा: करीब 2.50 लाख मीट्रिक टन
यहां जाता है प्याज: हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, हिमाचल सहित अन्य राज्य
किसानों से औसत खरीद मूल्य: लगभग 5 रुपए प्रति किलो
प्रोसेसिंग के बाद उत्पादों की कीमत: कच्चे माल से 30 गुना से अधिक
यदि सीकर जिले में प्याज प्रोसेसिंग यूनिट और कोल्ड स्टोरेज बनाए जाएं, तो यहां के युवाओं को रोजगार के अवसर मिल सकते हैं। किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिलने से जिले की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी। इसके बावजूद अब तक सरकार स्तर पर कोई ठोस योजना या घोषणा नहीं की गई है। नतीजतन यहां का कच्चा माल बाहर जा रहा है और मुनाफा भी दूसरे राज्यों में ही बन रहा है। सीकर के प्याज से अन्य राज्यों की फैक्ट्रियों में रोजगार और लाभ दोनों सृजित हो रहे हैं।
सीकर जिले में साल में तीन बार प्याज का बेहतर उत्पादन होता है। अलवर जिले के बाद प्याज उत्पादन में सीकर जिला शामिल है, लेकिन उचित भाव नहीं मिलने के कारण किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य नहीं मिल पाता है। प्रोसेसिंग इकाई नहीं होने से प्याज से अन्य उत्पाद तैयार नहीं हो पा रहे हैं।
Published on:
04 Feb 2026 06:44 pm
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