
दांतारामगढ़ (सीकर). हिन्दू रीति रिवाज के हिसाब से इंसान के शव को जलाया जाता है। आज भी देशभर के अधिकांश हिस्सों में शवों को लकडिय़ों से जलाया जाता है। मेट्रो सिटी व कई बड़े शहरों में विद्युत शवदाह गृह की सुविधा भी उपलब्ध है, मगर अब गाय के गोबर से बनी लकडिय़ों से भी दाह संस्कार होने लगा है। सीकर के दांता कस्बे में ऐसा मामला सामने आया है।
...ताकि लोगों का दे सकें संदेश
-दांता की मूल निवासी जिस महिला कांता सिकरिया का गोबर की लकडिय़ों से दाह संस्कार किया गया उनके परिजन अहमदाबाद, कोलकाता, उड़ीसा व अन्य स्थानों पर भी रहते हैं।
-परिवार में पहले भी किसी की मौत हुई तो उनका अंतिम संस्कार भी बाहर ही किया गया, लेकिन कांता देवी का 70 साल बाद यह पहला अंतिम संस्कार दांता में किया गया।
-वह भी महज इसलिए कि यहां के लोगों को भी गाय के गोबर के प्रति जागृति पैदा हो। कांता देवी के पति गोसवा से जुड़े हंै।
-कांता देवी का दाह संस्कार बुधवार को किया गया था। गोबर से बनी लकडिय़ां जयपुर से मंगवाई गई।
-कांता देवी के पति अहमदाबाद रहते हैं देशभर में वे गोसेवा पर व्याख्यान पर जागृति पैदा कर गायों को स्वावलम्बी बनाने का कार्य कर रहे हैं।
-उनके घर में मौत हो या खुशी, ईंधन के रूप में गाय के गोबर से बनी यह लकडिय़ां ही काम में ली जाती है।
-इतना ही नहीं उनकी टीम देशी गाय से निर्मित दैनिक उपयोगी सौ से अधिक उत्पाद बनाते हंै।
ऐसे बनती है गोबर से लकडिय़ां
दाह संस्कार के लिए करीब दो से तीन हजार रुपए की गोबर निर्मित लकड़ी लगती है। यह जयपुर में देशी गायो की गोशाल में बनती है। पहले गोबर से गीलापन दूर किया जाता है जो जैवित खेती में खाद के रूप में काम आता है। सूखे गोबर से मशीन में लकड़ीनुमा कंडे तैयार किए जाते हैं। गीला अलग करने व लकड़ी तैयार करने की दो अलग अलग मशीने आती है तो दो लाख के करीब आ जाती है। श्याम सिकरिया ने ऐसी मशीनें कोलकाता, उड़ीसा आदि अनेक जगह लगवाई है।
ईंधन का काम
राजस्थान का प्रसिद्ध चूरमा, बाटी गोबर की थेपड़ी( कंडो) पर बनाया जाता है जो इस लकड़ी पर आसानी से बन जाता है। इंधन के रूप में इस प्रकार काम आने पर गोशालाओ में बाय के गोबर की कीमत होगी तो गाय की सार संभाल ठीक से होने लगेगी।