
सिरोही. खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति निगम में रसद सामग्री उठाव व वितरण व्यवस्था में कुप्रबंधन का खामियाजा गरीबों को झेलना पड़ रहा है। जून में गेहूं का नीयत समय पर उठाव नहीं होने से जिले में करीब ३ हजार ५६३ किलो टन गेहूं लैप्स हो गया है। जिसका कारण गेंहू का गबन मामला बताया जा रहा है। खास बात को यह है कि भारतीय खाद्य निगम के अधिकारियों ने दो बार 15-15 दिन की अवधि बढ़ाने के बाद भी गेहूं का उठाव नहींं किया। सूत्रों के अनुसार खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग जयपुर सभी जगह पर एक माह के अग्रिम गेहूं उठाव करने के लिए अलॉटमेंट करता है । जिसको हर महीने की अंतिम तारिख को क्रय-विक्रम सहकारी समिति या परिवहन करता के मार्फत एफसीआई से गेहूं का उठाव कर सप्लाई करना होता है, लेकिन पिछले दिनों गेहूं के गबन के मामले को लेकर गेहूं का उठाव नहीं किया गया। इससे जिले के ४३४ डीलर को गेहूं सप्लाई नहीं किया गया। रविवार को अवकाश के दिन भी जिला कलक्टर के एक पत्र पर उदयपुर के क्षेत्रीय प्रबंधक के निर्देशन पर गोदाम को स्टॉक जारी करने के लिए खोला गया।
ये किया था आवंटन
खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति निगम की ओर से जुलाई का गेहूं आवंटन किया था। जिसकी निर्धारित वैधता ३० जून थी, लेकिन गबन के मामले में उठाव नहीं किया।इस पर क्षेत्रीय महाप्रबंधक जयपुर ने १५ जुलाई तक समय बढ़ाया, फिर भी राजस्थान राज्य खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति ने स्टॉक नहीं उठाया। उसके बाद कार्यकारी निदेशक भारतीय खाद्य निगम नोयडा ने राज्य सरकार के अनुरोध पर ३० जुलाई तक वैधता बढ़ाई, फिर भी ३ हजार ५६३ क्विंटल गेहूं का स्टॉक लैप्स हो गया।
यह हुआ था गबन
पिण्डवाड़ा में गोदाम से राशन के 347.56 5 क्ंिवटल गेहूं का गबन हुआ था।इसमें ठेकेदर तथा निगम प्रबंधक ने आपस में मामला दर्ज करवाया था।गबन के मामले में जिला कलक्टर ने पिण्डवाड़ा उपखण्ड अधिकारी को प्रशासनिक जांच सौंपी थी, जिसमें नागरिक आपूर्ति निगम प्रबंधक संदीपसिंह भाटी, जिला रसद अधिकारी महावीर प्रसाद की भी संलिप्ता मानी थी। हालांकि, जांच से पूर्वही दोनों को सम्बंधित विभागों ने निलम्बत कर दिया था।
बाजार से खरीदना
पड़ा गेहूं
रसद विभाग के मुताबिक गेहूं लैप्स होने के कारण हजारों उपभोक्ताओं को जुलाई में रसद सामग्री से वंचित रहना पड़ा है। कुछ उपभोक्ता तो ऐसे हैं जो कि खाद्य सुरक्षा योजना के तहत मिलने वाली सामग्री से ही परिवार का भरण-पोषण करते हैं। ऐसे में गेहूं नहीं मिलने पर बाजार से आटा खरीदकर काम चलाना पड़ रहा हैै।