सिरोही के आबूरोड क्षेत्र में गरासिया समाज की आपसी सहयोग पर आधारित ‘हालमा प्रथा’ आधुनिक जीवनशैली और खेती में बदलाव के कारण धीरे-धीरे समाप्त हो रही है।
सिरोही: आदिवासी समाज के लोग अपनी कुप्रथाओं को लेकर काफी जागरूक हो रहे हैं और ऐसी प्रथाओं से मुक्त होने के लिए समाज की बैठकों में निर्णय ले रहे हैं। हालांकि, बदलाव की इस प्रक्रिया का असर उन पारंपरिक प्रथाओं पर भी पड़ रहा है, जो समाज को जोड़ने और आपसी सहयोग की भावना को मजबूत करती थीं।
सिरोही जिले के टीएसपी आबूरोड ब्लॉक के गरासिया समाज में ऐसी ही एक पुरानी प्रथा ‘हालमा’ रही है, जिसके तहत खेती से लेकर घरेलू कार्यों तक में लोग एक-दूसरे की मदद करते थे। लेकिन बदलते समय के साथ यह सामूहिक सहयोग की परंपरा अब लुप्त होने के कगार पर है।
हालमा प्रथा के अंतर्गत संबंधित गांव के आदिवासी एक-दूसरे को खेतीबाड़ी कार्याें, केलूपोश झोपड़े निर्माण, मवेशियों की जंगल में चराई व घास लाने में सहयोग करते थे। इसके लिए किसी तरह का लेन-देन नहीं किया जाता। बस इस भावना से कि गांव का कोई परिवार परेशान नहीं हो, उनमें किसी तरक का मनमुटाव नहीं हो और समाज के लोग आपस में एक-दूसरे से जुड़े रहें।
हालमा में लाभांवित परिवार के लोग मदद करने वाले गांव के लोगों को गुड़ की कड़ी और परंपरागत अन्य मिष्ठान बनाकर खिलाते थे, जिससे प्रेम-प्यार बना रहे। इस प्रथा का सबसे बड़ा फायदा यह था कि गांव में आपस में झगड़े-फसाद नहीं के बराबर थे। लेकिन समय के बदलाव के साथ ही अब यह प्रथा लुप्त होती जा रही है।
हालमा प्रथा विशेष तौर पर खेती-बाड़ी कार्याें से जुड़ी थी। जिसने गांव के लोगों में खेती के साथ अन्य कार्याें में सहयोग की भावना विकसित की। आज गरासिया समाज के किसान आधुनिक खेती की तकनीक को तेजी से अपना रहे हैं। कृषि कार्याें में बैलों का महत्व काफी कम हो गया है। घरों में ईंधन के लिए गैस सिलेंडर का उपयोग कर रहे हैं। झोपड़ों की जगह पक्के मकान बनाकर रह रहे हैं। वर्तमान में खेती की तकनीक और रहन-सहन में हुए इन बदलावों से यह प्रथा समाप्त होती जा रही है।
हमारे समाज की पुरानी हालमा प्रथा में गांव के लोग बिना लेनदेन के खेती व अन्य कार्याें में एक-दूसरे की मदद करते थे। अब समय बदल गया है। आबूरोड क्षेत्र मेें शायद ही यह प्रथा देखने को मिले।
हालमा में आपसी सहयोग की भावना का भाव है। इस प्रथा के तहत गांव के लोग बैठकर समाज के संबंध में चर्चा व नि:शुल्क एक-दूसरे की मदद करते थे। क्षेत्र के कुछ गांवों में यह प्रथा जीवंत हो सकती है। पहले तो हरेक गांव में थी।