
सोनभद्र . नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने आदित्य बिड़ला समूह की ग्रासिम केमिकल इंडस्ट्रीज लिमिटेड की फैक्ट्री पर जो एक करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है, यह संभव हो सका गंगा के लिये अपने प्राणों को न्योछावर करने वाले प्रो. जीडी अग्रवाल उर्फ स्वामी सानंद की वजह से। स्वामी सानंद ने ही चार साल पहले इलाके में पारे के खतरनाक स्तर पर भंडारण के बारे में एनजीटी की कोर कमेटी को जानकारी दी थी। उसी के बाद आयी रिपोर्ट पर एनजीटी ने ग्रासिम केमिकल इंडस्ट्रीज लिमिटेड की फैक्ट्री पर 1 करोड़ रुपये का अंतरिम जुर्माना लगाया है। जुर्माना सोनभद्र की दुद्धी तहसील के रेनुकूट में स्थित फैक्ट्री में बाई-प्रॉडक्ट के तौर पर निकलने वाले पारे का भारी मात्रा में स्टॉक जमा करने के लिए लगाया गया है। जुर्माना एनजीटी पास जमा होगा, जो इस धनराशि का उपयोग प्रभवित क्षेत्रों में नष्ट हुए पर्यावरण को पुनर्जीवित करने में करेगा।
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एनजीटी के चेयरमैन जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने ग्रासिम इंडस्ट्रीज को हानिकारक अपशिष्ट 2016 के खतरनाक कचरा प्रबंधन नियमों के मुताबिक किसी सुरक्षित जगह स्थानांतरित करने का भी आदेश दिया है। प्रदुषण फैलाने वाले कम्पनी की तरफ से 28 अगस्त, 2018 के आदेश के खिलाफ दाखिल पुनर्विचार पर सुनवाई कर रही पीठ ने हानिकारक अपशिष्ट को सुरक्षित करने का यह काम एक माह के अंदर पूरा करने व इसकी निगरानी के लिए केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, सीपीसीबी और आईआईटी कानपुर के एक-एक प्रतिनिधि की मौजूदगी वाली संयुक्त समिति भी गठित करने का आदेश दिया।
कैसे मिली पारे की सूचना
सिंगरौली परिक्षेत्र में फैले प्रदूषण से निजात के लिये एनजीटी ने 28 अगस्त 2018 के आदेश में एनजीटी ने हानिकारक कचरे को शिफ्ट करने का निर्देश दिया था। एनजीटी ने यह आदेश उस रिपोर्ट के आधार पर दिया, जिसे प्राधिकरण द्वारा ही गठित पैनल ने तैयार किया था। पैनल ने रिपोर्ट में कहा था कि कंपनी ने 2012 में उत्पादन के दौरान बाई-प्रॉडक्ट के तौर पर भारी मात्रा में पारे की उपस्थिति वाला लवणीय कचरा एकत्र कर फैक्ट्री परिसर में ही जमा करके रखा है। इस तथ्य की जानकारी कमेटी के अध्यक्ष को उस समय बनवासी सेवा आश्रम में ही मौजूद स्वामी सांनंद ने प्रत्यक्ष रूप से नोट कराकर दी थी। उसी दिन कमेटी ने उक्त केमिकल इंडस्ट्री का दौरा किया और स्वामी जी की बातों को अक्षरशः सत्य पाया। बाद ने पैनल ने ही कंपनी पर खतरनाक स्तर के अपशिष्ट एकत्र करने पर एक करोड़ रुपये का जुर्माना लगाने की सिफारिश की थी।
हवा, मिट्टी, पानी में बढ़ते प्रदूषण के चलते जहां सिंगरौली परिक्षेत्र को जिसमे सोनभद्र और सिंगरौली आते हैं देश के तीसरे सर्वाधिक प्रदूषित क्षेत्र माना जा चुका है। पर्यावरण विशेषज्ञ इलाके में पारे की खतरनाक स्तर पर अधिकता को देखते हुए इस इलाके को पारे के दुष्प्रभाव से तबाह हुए जापान के शहर "मिनामाटा" की राह पर तेजी से बढ़ता बताते हैं। भूमिगत पेयजल में फ्लोराइड की अधिकता और इसके चलते दुद्धी, चोपन, म्योरपुर और बभनी ब्लाक के गांवों में विकलांग होती पीढ़ी को लेकर 20 साल पहले ही खुलासा हो गया था। तब से अब तक प्रभावी राहत के नाम पर ज्यादातर कागजी घोड़े ही दौड़ाए गए। इस दंश से निजात मिलती, इससे पहले 2012 में सुनीता नारायण की संस्था सीएसई ने इलाके से एकत्र किये नमूनों के परीक्षण के बाद इंसान के रक्त में, बालो में, खाद्य पदार्थो में , इलाके की मछलियों समेत रग-रग में पारे की मौजूदगी का खुलासा कर खलबली मचा दी।
अपने गहन अनुसंधान के बाद वर्ष 2012 में लखनऊ में प्रेस कांफ्रेंस कर बताया गया कि हवा, मिट्टी, पानी के साथ पशु, पक्षी, जानवर, खाद्य पदार्थो सभी में पारे की स्थिति खतरनाक स्तर पर विद्यमान हो चुकी है। इसके बाद भी जिम्मेदार नियंत्रण के उपाय बनाने की बजाय इसे झुठलाने में लगे रहे। इसके बाद इलाके में पर्यावरण पर कार्य कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता जगत नारायण विश्वकर्मा और अश्विनी दुबे की अलग अलग याचिकाओं पर एकसाथ सुनवाई करते हुए एनजीटी के निर्देश पर 2015 में कोर कमेटी ने जब विस्तृत अध्ययन किया तो यहां के वायुमंडल में हर दिन 14 किलो पारा घुलने की रिपोर्ट देकर सरकारी तंत्र को सोचने पर विवश कर दिया।
क्या उपाय करने हैं प्रदूषण रोकने को
इलाके में प्रदूषण के अत्यंत सोचनीय स्तर पर पहुंच जाने के हालात को देखते हुए सड़क मार्ग से कोयला ढुलाई रोकने, फ्लोराइड के विस्तृत अध्ययन के लिए दो केंद्र स्थापित करने, चिकित्सकों को विशेष ट्रेनिंग देने, अत्याधुनिक अस्पताल स्थापित करने जैसे कई सुझाव दिए गए। 2018 में एनजीटी ने इसके पालन के लिए स्पष्ट निर्देश जारी करते हुए इसकी नियमित निगरानी के लिए ओवरसाइट कमेटी का गठन किया। इलाके में गम्भीर स्तर पर पहुंच गये प्रदूषण की रोकथाम के एक भी सुझाव पर अब तक प्रभावी अमल नहीं हो पाया है। एनजीटी की सख्ती के बाद प्रभावित ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल के लिए आरओ प्लांट तो लगाए गए लेकिन पानी का बड़ा हिस्सा बर्बाद होने, अत्यधिक जल दोहन से बढ़ते प्रदूषण को रोकने को लेकर कोई उपाय अमल में नहीं लाए गए। अब जाकर एनजीटी ने आदित्य बिड़ला ग्रुप की ग्रासिम इंडस्ट्री पर एक करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है।