राजस्थान के गर्म शुष्क क्षेत्रों में शुमार बीकानेर में दिन व रात के तापमान में बहुत अधिक अन्तर रहता है। साथ ही ग्रीष्मकाल में बहुत तेज धूल भरी व गर्म हवा वाली आंधी चलती है। बारिश भी बहुत कम होती है। सिंचाई के लिए भू-जल बहुत गहराई पर है। इतनी प्रतिकूलताओं के चलते भी यहां सब्जियों की बम्पर पैदावार हो रही है। यह संभव हुआ है लो टनल तकनीक से।
इस तकनीक से यहां के किसान लगभग 2000 हेक्टेयर क्षेत्रफल में कद्दूवर्गीय सब्जियां जैसे ककड़ी, टिंडा, छप्पन कद्दू, खरबूजा, तरबूज, लौकी, तोरई, टिंडा, काचरी, फुट, ककड़ी आदि की खेती कर रहे हैं।
कम लागत में हो जाता है तैयार
लो टनल तकनीक एक छोटे प्रकार की कम ऊंचाई वाली गुफानुमा संरक्षित संरचना है, जिसे खेत में फसल की बुवाई के बाद प्रत्येक लाइन के ऊपर कम ऊंचाई पर प्लास्टिक की चादर से ढक कर बनाया जाता है। मुख्य रूप से यह एक छोटा ग्रीन हाउस होता है, जो कम लागत में आसानी से तैयार किया जा सकता है। प्लास्टिक की चादर से ढकने के कारण टनल का तापमान बाहर की तुलना में ज्यादा होता है। इस कारण अंदर ग्रीनहाउस प्रभाव दिखाई देता है।
सुरंग में खेती करने जैसा अनुभव
टनल का निर्माण लोहे के सरिए/ बांस तथा पॉलीथिन की शीट से किया जाता है। इसमें सब्जियों की बुवाई के बाद ड्रिप पद्धति से सिंचाई की जाती है। यह एक तरह से सुरंग में खेती करने जैसा अनुभव है। इसके अन्दर का तापमान बाहरी वातावरण के तापमान से छह से आठ डिग्री सेल्सियस अधिक होने के कारण पौधों की वानस्पतिक वृद्धि होती रहती है। मौसम फसल के अनुकूल होने के बाद टनल को हटा दिया जाता है।
इनका कहना है
&यह तकनीक गर्म शुष्क क्षेत्रों में कद्दूवर्गीय सब्जियों की अगेती/ बेमौसम खेती का एक बेहतरीन विकल्प है। बोई गई फसल से 40-50 दिन पहले फलों की तुड़ाई शुरू हो जाती है। पौधों की समुचित बढ़वार से पौध तैयार करने में समय कम लगता है। कीटों व बीमारियों का प्रकोप भी अपेक्षाकृत कम होता है। फसल को ठंड और पाला से बचाने में कारगर है। इसलिए इससे अधिक ठंड में भी सब्जियों की पौध सफलतापूर्वक तैयार की जा सकती है।
- डॉ. बी. आर. चौधरी, सब्जी विज्ञान के प्रधान वैज्ञानिक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद केन्द्रीय शुष्क बागवानी संस्थान, बीकानेर
- जितेन्द्र गोस्वामी