
मंगेश कौशिक/श्रीगंगानगर। महाराजा गंगासिंह जानते थे कि उनके अग्रज डूंगरसिंह ने रियासत के उत्तरी भूभाग को सिंचित करने के लिए अबोहर नहर का पानी लाने के लिए 1884 में जो प्रस्ताव दिया था, उसे पंजाब सरकार ने खारिज कर दिया था। उस प्रस्ताव का बाद में पंजाब के इंजीनियर कर्नल डयास ने समर्थन करते हुए सतलुज के पानी से बीकानेर रियासत के पंजाब से सटे इलाके को सिंचाई सुविधा देने का सुझाव दिया तो महाराजा गंगासिंह ने कर्नल डयास के सुझाव को आधार बना कर सतलुज नदी का पानी नहर के माध्यम से लाने की दिशा में प्रयास शुरू कर दिए।
बीकानेर रियासत की ओर से लगातार किए जा रहे प्रयासों का यह फायदा हुआ कि वायसराय कर्जन ने अंग्रेज अधिकारी कॉलिन स्कॉट मोनक्रेफ की अध्यक्षता में एक समिति गठित कर बीकानेर रियासत को सतलुज नदी का पानी उपलब्ध करवाने के बारे में रिपोर्ट तैयार कर पेश करने को कहा। समिति ने जो रिपोर्ट दी वह बीकानेर रियासत के पक्ष को मजबूत करने वाली थी।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख किया कि नदी के तट पर होने से किसी राज्य या रियासत को ही उस नदी के जल के उपयोग का अधिकार नहीं माना जा सकता, विशेषकर नदी में प्रवाहित अतिरिक्त जल के संबंध में। इसके बाद कॉलिन स्कॉट मोनक्रेफ पंजाब के वायसराय बने तो उन्होंने 24 अक्टूबर 1905 को अपनी रिपोर्ट में बीकानेर रियासत को सतलुज नदी का पानी उपलब्ध करवाने की पुष्टि कर दी।
पंजाब के वायसराय की रिपोर्ट में बीकानेर रियासत को सतलुज का पानी उपलब्ध करवाने की पुष्टि होने के बाद महाराजा गंगासिंह इस कार्य को आगे बढ़ाने में लगे रहे। उन्हीं के सतत प्रयासों का ही प्रतिफल था कि भारत सरकार के आदेश पर आर.जी. कैनेडी ने सतलुज घाटी परियोजना की जो रिपोर्ट तैयार की थी, उसमें भी बीकानेर रियासत के उत्तरी भाग को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने का प्रावधान किया गया था। इसके बाद 1906 में बीकानेर रियासत के उत्तरी भूभाग को सतलुज के पानी से सिंचित करने का निर्णय हुआ, लेकिन इस पर स्वीकृति की मुहर 1912 में लगी।
सतलुज का पानी सिंचाई के लिए बीकानेर रियासत को दिए जाने के निर्णय होने के साथ ही विवाद शुरू हो गया। बहावलपुर रियासत के इस निर्णय का विरोध किए जाने के बाद पंजाब सरकार का रवैया भी बदल गया और वह भी बहावलपुर रियासत की तरह बीकानेर रियासत को सतलुज का पानी देने की राह में रोड़े अटकाने लगी। इसी बीच प्रथम विश्व युद्ध शुरू होने के कारण सतलुज नदी के जल पर कोई समझौता नहीं हो पाया। उधर, महाराजा गंगासिंह ने अपनी रियासत की घोरों वाली धरती को सरसब्ज बनाने के लिए अपने प्रयास और पैरवी जारी रखी। अपने तर्कसंगत तरीकों से वह भारत सरकार से बीकानेर रियासत को सतलुज नदी के जल से सिंचाई सुविधा देने को न्यायसंगत एवं वैध साबित करवाने में सफल रहे।
बहावलपुर रियासत और पंजाब सरकार की ओर से परियोजना की राह में अटकाए जा रहे रोड़ों को हटाने के लिए सतलुज घाटी सिंचाई परियोजना की तकनीकी दृष्टि से समीक्षा करने का निर्णय भारत सरकार ने किया। इसके लिए 10 व 11 दिसंबर 1919 को दिल्ली में त्रिपक्षीय सम्मेलन बुलाया गया। इसमें बात नहीं बनी तो 4 सितंबर 1920 को शिमला में एक समझौता हुआ, जिसके मसौदे पर बहावलपुर और बीकानेर रियासत तथा पंजाब प्रांत के प्रतिनिधियों ने सहमति व्यक्त करते हुए हस्ताक्षर किए और परियोजना को स्वीकृति के लिए सेक्रेटरी ऑफ स्टेट को भिजवा दिया।
बीकानेर रियासत के उत्तरी भूभाग को सतलुज के पानी से सिंचित करने के लिए महाराजा गंगासिंह को लगभग 18 साल कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। उन्हीं के प्रयासों से नदी जल गैर तटीय इलाकों को देने की नीति इस देश में बनी। सभी बाधाएं हटने पर फिरोजपुर के नजदीक हुसैनीवाला में 5 दिसंबर 1925 को महाराजा गंगासिंह ने अपने हाथों से हैडवर्क्स का शिलान्यास किया।