Delhi High Court POCSO: दिल्ली हाई कोर्ट ने POCSO मामले में कहा कि अगर आरोप केवल अपराध की 'कोशिश' का है, तो आरोपी को 'पूरे अपराध' की सजा नहीं मिल सकती। कोर्ट ने एक आरोपी की सजा 5 साल से घटाकर 3.5 साल की।
Delhi High Court:दिल्ली हाई कोर्ट ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) कानून के तहत एक मामले की सुनवाई करते हुए महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया है। कोर्ट ने कहा कि किसी आरोपी को उस अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जिसका उस पर औपचारिक रूप से आरोप ही नहीं लगाया गया हो।
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला साढ़े चार साल की एक नाबालिग बच्ची के साथ यौन हमले से जुड़ा है। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को POCSO एक्ट की धारा 9(m) और धारा 10 के तहत 'गंभीर यौन हमला' (Aggravated Sexual Assault) का दोषी मानते हुए 5 साल की सख्त कैद की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस सजा के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।
आपको बता दें कि इस मामले में जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने फाइलों का अध्ययन करने के बाद पाया कि आरोपी पर ट्रायल कोर्ट ने जो आरोप (Charge) तय किया था, वह केवल अपराध करने की 'कोशिश' (धारा 18) का था, न कि अपराध को 'अंजाम देने' का। इसके बाद सुवनाई के दौरान अदालत ने कहा, 'ट्रायल कोर्ट ने कभी भी 'कोशिश' के आरोप को बदलकर 'अपराध को अंजाम देने' का आरोप नहीं बनाया। जब आरोपी पर पूरे हुए अपराध का चार्ज ही नहीं लगाया गया, तो उसे उस अपराध के लिए दोषी ठहराना कानूनी तौर पर गलत है।'
दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि न्याय प्रक्रिया में साक्ष्यों के साथ-साथ कानूनी प्रक्रियाओं की शुद्धता भी अत्यंत अनिवार्य है। अदालत ने स्पष्ट रूप से माना कि हालांकि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री और सबूतों से 'गंभीर यौन हमला' होने की पुष्टि हो रही है, लेकिन चूंकि ट्रायल कोर्ट ने शुरुआत में आरोपी पर केवल अपराध करने की 'कोशिश' का ही चार्ज लगाया था, इसलिए कानूनी और तकनीकी मर्यादाओं को ध्यान में रखते हुए सजा को संशोधित करना अनिवार्य हो जाता है। जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने कानून की व्याख्या करते हुए आरोपी की सजा को धारा 10 (गंभीर यौन हमला) से बदलकर धारा 18 (अपराध करने का प्रयास) के अंतर्गत कर दिया। अदालत ने इस वैधानिक प्रावधान का हवाला दिया कि किसी भी अपराध के 'प्रयास' या 'कोशिश' के लिए दी जाने वाली सजा, उस मूल अपराध के लिए निर्धारित अधिकतम सजा की आधी अवधि से अधिक नहीं हो सकती।