कम्युनिस्ट पार्टी के नेता मजदूरों को लेकर उनकी समस्या के लिए जिंदाबाद-मुर्दाबाद के नारे लगाते हैं
सुल्तानपुर. जिले में न तो कोई मजदूर यूनियन है और न ही उनको संगठित कर उन्हें उनकी ताकत का एहसास कराने वाला नेतृत्व। जिले के एक दो कम्युनिस्ट पार्टी के नेता जरूर हैं, जो यदाकदा दस पांच मजदूरों को लेकर उनकी किसी समस्या के लिए जिन्दाबाद-मुर्दाबाद का नारा लगाते दिखाई दे जाते हैं। लेकिन इन नेताओं ने जिले के मजदूरों को कभी संगठित नहीं किया और न ही कोई प्रयास किया।
श्रम विभाग की ओर से मिली साइकिल
वर्ष 1923 से शुरू हुआ मजदूर दिवस जिले में आज तक मजदूरों को कोई मुकाम हासिल नहीं करा पाया। जहां तक जिले के मजदूरों की बात है, तो जिले भर के असंगठित मजदूरों का शहर के शाहगंज चौराहे पर अस्थायी तौर पर ठिकाना है। यहां वे ग्राहकों के इंतजार में खड़े होकर भेंड़ बकरियों की तरह बिकने का इंतजार करते हैं । शहर के बीचोबीच लगने वाली यह मजदूर मंडी पुलिसिया रहमोकरम पर पूरी तरह आश्रित है। पूर्ववर्ती अखिलेश यादव सरकार में मजदूरों के पंजीकरण कराने का अभियान चलाया गया था, जिसमें जिले से करीब 275 मजदूरों का पंजीकरण हुआ था। इन पंजीकृत मजदूरों को श्रम विभाग की ओर से साइकिल दी गयी थी। मजदूरों को साइकिल मिलने की खबर से उत्साहित कुछ अन्य लोगों ने भी श्रम विभाग और नगरपालिका में मजदूर के रूप में पंजीकरण कराया। लेकिन उन्हें आज तक कोई काम ? नहीं मिल सका। केंद्र सरकार द्वारा संचालित अति महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा भी मजदूरों को रोजगार देने की गारंटी नहीं दे पा रही है।
मजदूरों की समस्या उठाने वाले ज्यादातर बेरोजगार
हालांकि मनरेगा योजना के तहत जॉब कार्ड धारक हर मजदूर को साल में कम से कम 100 दिनों के काम की गारंटी देने की योजना है। लेकिन मजदूरों के पलायन रोकने वाली यह योजना भी पूरी तरह बेपटरी है। बाबूओं और अफसरों के बेमेल गठजोड़ ने मनरेगा को " मन रे गा झूम के " बना दिया है । देखने वाली बात यह है कि जिले में चाय पान की दुकानों, होटलों, ढाबों , ईंट भट्ठों पर बाल मजदूरों से बेधड़क मजदूरी कराई जा रही है और जिम्मेदार आंख बंद किये आंकड़े ठीक कर रहे हैं। जिले में आद्योगिक मजदूर नहीं हैं । जिन्हें हरावल दस्ता मानते हुए वामपंथ ने अपना ककहरा शुरू किया था । सच कहा जाए, तो वामपंथ का अर्थ ही होता था श्रमिक आंदोलन। लेकिन इस जिले में किसी भी संगठन द्वारा किया जाने वाला श्रमिक आंदोलन बहुत दूर जा चुका है। जिले में भारतीय मजदूर संघ का भी कोई अस्तित्व नहीं है। जिले में जन समस्याओं के लिए आंदोलन करने वालों में मजदूरों की सहभागिता शून्य ही रहा है। उन आंदोलनों में मजदूरों की समस्याओं को उठाने वाले ज्यादातर बेरोजगार थे या फिर छंटनीशुदा लोग जिनकी नौकरी किसी कारण वश छीन गई थी।
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