सूरत

VNSGU : आखिर व्यारा के कॉलेज को देनी पड़ी मान्यता

एक और विवाद में कुलपति को पीछे हटना पड़ा

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Oct 05, 2018
VNSGU : आखिर व्यारा के कॉलेज को देनी पड़ी मान्यता

सूरत.

वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ.शिवेन्द्र गुप्ता को आखिरकार व्यारा होम्योपेथी कॉलेज को मान्यता देनी पड़ी। डॉ. घनश्याम रावल के साथ चल रहे विवाद के कारण व्यारा कॉलेज को मान्यता नहीं दी गई थी।
विवाद को लेकर व्यारा होम्योपेथी कॉलेज के प्राध्यापक डॉ.घनश्याम रावल पर कुलपति ने कार्रवाई की थी। डॉ.रावल को विश्वविद्यालय के सभी पदों के दूर कर दिया गया था। साथ ही व्यारा होम्योपेथी कॉलेज को मान्यता नहीं दी गई थी। एलआइसी की रिपोर्ट नेगेटिव होने का हवाला देकर कॉलेज को मान्यता नहीं दी गई। डॉ.रावल ने कार्रवाई के खिलाफ उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। न्यायालय में डॉ.गुप्ता की कार्रवाई पर फटाकार लगाते हुए विश्वविद्यालय के आदेश वापस लेने का निर्देश दिया। डॉ.रावल पर की गई कार्रवाई को रद्द किया गया और उनका नाम सिंडीकेट की मतदाता सूची में भी शामिल किया गया। सिंडीकेट चुनाव में कुलपति के विरोधी दल के उम्मीदवारों की जीत के बाद व्यारा होम्योपेथी कॉलेज का मामला फिर चर्चा में आया।
कॉलेज को मान्यता देने की मांग उठी। कुलपति को इस संदर्भ में ज्ञापन भी सौंपा गया। कुलपति को मांग के सामने झुकना पड़ा और नई एलआइसी कॉलेज भेजनी पड़ी। नई एलआइसी की रिपोर्ट पॉजिटिव होने पर कुलपति को कॉलेज को मान्यता देनी पड़ी। कॉलेज को मान्यता मिलते ही रुके पड़े 70 से अधिक प्रवेश शुरू हो गए हैं।
सिंडीकेट चुनाव के बाद कुलपति डॉ.शिवेन्द्र गुप्ता के विभिन्न निर्णयों को लेकर उन्हें घेरने का प्रयास शुरू हो गया है। कुलपति और डॉ.घनश्याम रावल के बीच विवाद को लेकर व्यारा हॉम्योपेथिक कॉलेज को इस साल विवि ने मान्यता नहीं दी। हॉम्योपेथी में भी अन्य पाठ्यक्रमों की तरह केन्द्रीय प्रवेश प्रणाली से प्रवेश दिया जाता है। प्रवेश समिति ने व्यारा हॉम्योपेथी कॉलेज को प्रवेश सूची में शामिल किया था। कई विद्यार्थियों को इस कॉलेज में प्रवेश के लिए चुना गया, लेकिन विश्वविद्यालय की ओर से शैक्षणिक सत्र 2018-19 के लिए मान्यता नहीं मिलने पर प्रवेश पाकर भी विद्यार्थी प्रवेश से वंचित हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन ने एलआइसी रिपोर्ट के नाम पर कॉलेज को मान्यता नहीं दी है। कई सिंडीकेट सदस्यों ने आरोप लगाया है कि कुलपति की ओर से नियुक्त एलआइसी ने यह रिपोर्ट दी है। कुलपति पर आरोप लगाया गया कि डॉ.रावल के साथ विवाद के कारण ही व्यारा कॉलेज को मान्यता नहीं दी गई। कॉलेज को मान्यता दिलाने के लिए सिंडीकेट सदस्य डॉ.कश्यप खरचिया कई हॉम्योपेथी प्राध्यापकों के साथ कुलपति से गुजारिश करने पहुंचे। डॉ.खरचिया ने बताया कि कॉलेज को मान्यता नहीं मिली तो कई विद्यार्थी प्रवेश नहीं पा सकेंगे।

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अदालत के आदेश का किया उलघंन
विश्वविद्यालय के सिंडीकेट सदस्य घनश्याम रावल के खिलाफ कुलपति डॉ.शिवेन्द्र गुप्ता को शिकायत की गई थी। रावल की डिग्री और इस डिग्री के आधार पर हासिल नौकरी और विश्वविद्यालय के विभिन्न पदों को गैैरकानूनी बताया गया। इस आरोप के बाद घनश्याम रावल और कुलपति डॉ.गुप्ता के बीच विवाद शुरू हुआ। डॉ.गुप्ता ने रावल को सभी पदों से हटाने की अधिसूचना जारी की। साथ ही सिंडीकेट बैठक में उनकी उपस्थिति पर रोक लगा दी। इस अधिसूचना के बाद रावल ने हाइकोर्ट में याचिका दायर कर ७ सितम्बर को स्टे हासिल किया। स्टे की कॉपी लेकर रावल सिंडीकेट की बैठक में पहुंचे। साथ ही रावल ने कुलपति डॉ.गुप्ता की डिग्री और उनकी योग्यता पर सवाल खड़े किए। कुलपति पद पर उनकी योग्यता के खिलाफ न्यायालय में याचिका दायर की। इसके बाद मामला कानूनी लड़ाई में बदल गया, लेकिन सिंडीकेट चुनाव पास आने पर फिर से डॉ.गुप्ता और उनके दल ने मिलकर रावल के खिलाफ कार्रवाई करना शुरू किया। सिंडीकेट चुनाव की अधिसूचना जारी होने से ठीक पहले रावल को पुन: सभी पदों से हटाने की विश्वविद्यालय प्रशासन ने अधिसूचना जारी की। इस अधिसूचना के जारी होते ही फिर रावल ने न्यायालय में याचिका दायर की। न्यायालय ने पुन: विश्वविद्यालय की अधिसूचना पर स्टे लगा दिया है। साथ ही विश्वविद्यालय को फटकार लगाई है कि जब न्यायालय की ओर से रावल को राहत दी गई तो फिर विश्वविद्यालय ने उन्हें पद से हटाने की अधिसूचना कैसे जारी की है। अदालत के आदेश का उलघंन किया जा रहा है।

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Published on:
05 Oct 2018 06:34 pm
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