पिता से मिले संस्कार ने ‘मीरा’ को बनाया दूसरों से जुदा

शासकीय नौकरी छोडऩे के बाद 22 सालों से उपेक्षित व शोषित महिलाओं और बालिकाओं की कर रहीं हैं सेवा

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Mar 08, 2016
Meera shukla with women
अंबिकापुर.
आज देश की महिलाओं को भले ही अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा हो, लेकिन शहर में एक महिला ऐसी हैं, जिन्हें उनके पत्रकार पिता से मिले संस्कार ने औरों से जुदा बना दिया है। मीरा शुक्ला ने वर्ष 1994 में शासकीय नौकरी से इस्तीफा देने के बाद लोगों की मदद करना ही अपनी जिंदगी का लक्ष्य बना लिया।


उन्होंने ने आत्मविश्वास, मेहनत और लगन के दम पर समाज सेवा के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित किए हैं। समाज सेवा के संघर्ष में कदम से कदम मिलाकर आज जिले की सैकड़ों महिलाओं ने समाज का नजरिया भी बदल दिया है।


मीरा को उनके पिता ने हमेशा हिम्मत से चुनौती का सामना करने की शिक्षा दी। यही वजह है आज हर परिस्थिति का सामना कर लोगों की मदद करने के लिए एमएसएसव्हीपी की संचालिका मीरा शुक्ला हमेशा खड़ी नजर आती हैं। महिला दिवस पर समाज सेविका मीरा शुक्ला ने पत्रिका से चर्चा करते हुए बताया कि समाज या यूं कहें कि किसी भी असहाय की हर तरह से मदद करना, यह बच्चा घर से ही सीखता है।


जैसे माहौल में हम रहते हैं व देखते हैं, वैसा ही बनने का प्रयास करते हैं। मेरे साथ भी वैसा ही हुआ। पिताजी भोपाल में वरिष्ठ पत्रकार थे। मैंने उन्हें अपना आदर्श माना और फिर मै भी उन्हीं की तरह लोगों की मदद करने में जुट गई और इसी रास्ते पर आगे चल पड़ी। वर्ष 1990 में उनका विवाह अंबिकापुर में एक संयुक्त परिवार में हुआ। उन्होंने बताया कि नई-नवेली दुल्हन होने के बावजूद लोगों की डांट सुनने के बाद भी हमेशा वे लोगों की मदद के लिए खड़ी रहती थी।


पूरी रात अस्पताल में सेवा भाव से किसी की भी मदद करने में काफी सुकून मिलता था। साक्षरता मिशन की शासकीय नौकरी से वर्ष 1994 में इस्तीफा देने के बाद उन्होंने समाज सेवा को अपनी जिंदगी का लक्ष्य बना लिया। उन्होंने कहा कि समाज सेवा वही है जो दूसरे के आंख में आंसू न देखे। आंसू आने से पहले ही उसे रोक ले। इंसान वह है जो अपने लिए न जी कर दूसरों के लिए जीए।


30 बच्चों को गोद लेकर किया शिक्षित

मीरा ने वर्ष 1998 में उदयपुर के ग्राम सोहगा के 30 बच्चों को गोद लेकर समाजसेवा के क्षेत्र में संघर्ष की शुरूआत की। उन्होंने बताया कि उन्होंने 30 बच्चों को बिना किसी मदद के न केवल उन्हें शिक्षित किया, बल्कि उन्हें आगे बढऩे के लिए प्रेरित किया। इनमें से अधिकांश बच्चे आज बेहतर जिंदगी जी रहे हैं।


भीख मांगने से दूर किया महिलाओं को

शहर के अंदर पहले काफी महिलाएं शनिवार को शनि देव के नाम पर भीख मांगती थीं। मीरा ने ऐसी महिलाओं का 12 समूह बनाने के बाद उनकी जिंदगी संवारने का काम शुरू किया। हेल्पिंग इंडिया की मदद से उन्हें बकरियां दिलवाईं। जिसे महिलाओं ने अपने जीविका का साधन बना लिया।


इनमें से अधिकांश महिलाएं आज 20-25 से अधिक बकरियों की स्वामी हैं और इनसे होने वाली आय से आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं। समाज कल्याण भोपाल द्वारा मीरा की संस्था को सबसे पहली मदद के रूप में 30 महिलाओं को प्रौढ़ शिक्षा देने के लिए तीन हजार रुपए की मदद मिली थी। इन 30 महिलाओं में से 29 महिलाएं परीक्षा में उत्तीर्ण हुई थीं।


माता-पिता ने जिन्हें छोड़ा, उन्हें दिया सहारा

मीरा आज ऐसी 50 बालिकाओं की मां बनकर देखभाल कर रही हैं, जिन्हेंं उनके माता-पिता ने भी किसी न किसी कारण से छोड़ दिया है। उन्होंने ऐसी महिलाओं को भी सहारा दिया है, जिनके गोद में बच्चे थे। लेकिन उनके पति और परिजन का कुछ पता नहीं था। कुछ ऐसी किशोरियां भी हैं, जो अनाचार की भी शिकार हो चुकी हैं। उन्होंने लगभग 200 से अधिक महिलाओं को पुनर्वास के माध्यम से सशक्त किया है।


5 महिलाओं का पुनर्विवाह भी कराया है। इसके साथ जिन्हें घर ले जाने से उनके माता पिता भी इंकार कर देते हैं, उन्हें भी पढ़ा-लिखाकर बेहतर कैरियर बनाने की सलाह देने के साथ उनका विवाह भी संपन्न कराया। आज उनके साथ 100 से अधिक महिलाएं समाज सेवा के क्षेत्र में कार्य कर रही हैं। ऐसी सभी महिलाएं व बच्चियां मीरा शुक्ला को मां कह कर ही संबोधित करती हैं।
Published on:
08 Mar 2016 12:23 pm
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