डॉ शुक्ला की कलम और तूलिका दोनों ही समभाव से अनवरत चलती हैं, उनके शब्द और रेखाएं समाज को संवेदनीय आभा प्रदान करतीं है।
निवाई. डॉ अन्नपूर्णा शुक्ला का लालन पालन कला और साहित्य के गलियारे में ही हुआ। मां लोक कलाओं की जानकार और पिता दर्शन सौंदर्य के विचारक, चाचा ललित कलाओं के मर्मज्ञ। ये पिरामिड अन्न्पूर्णा के व्यक्तित्व का आधार रहा है। यहीं ललित कलाओं का बचपन का आधार आज समाज को संवेदनीय नवीन कृतियों द्वारा सजा रहा है।
आज शुक्ला बनस्थली विद्यापीठ के चित्रकला विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। डॉ शुक्ला की चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिसमें वनगो और निराला: काव्य और कला की अंतनंगता 2005, किशनगढ़ चित्र शैली 2007, जलरंग : प्रयोग और पद्धति 2014 में राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी जयपुर से प्रकाशित हुई हैं तीनों के द्वितीय संस्करण भी प्रकाशित हो चुकें हैं।
ये पुस्तकें मानव संसाधन विकास मंत्रालय , माध्यमिक शिक्षा और उच्चतर शिक्षा विभाग के लिए स्वीकृत हैं। चौथी पुस्तक फुर्सत से सोचना (कविता संग्रह)जो सनातन प्रकाशक जयपुर से प्रकाशित हुई है । पाचवीं पुस्तक 'यत्र तत्र सर्वत्र-ललित निबंध' प्रकाशक के आधीन है।
'वनगो निराला' पुस्तक पर- 'नव निकष कला श्री सम्मान 2018 ' प्राप्त हो चुका है। पुस्तक व कला के क्षेत्र में डॉ. शुक्ला को राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय स्तर पर दर्जनों पुरस्कार मिल चुके है। डॉ शुक्ला की कलम और तूलिका दोनों ही समभाव से अनवरत चलती हैं, उनके शब्द और रेखाएं समाज को संवेदनीय आभा प्रदान करतीं है। उनका उद्देश्य ही यहीं रहता है कि जो भी अभिव्यक्ति हो वो समाज में मानवीय भावनाओं को चेतना प्रदान करे और युवाओं को नवीन सृजनात्मक दिखा प्रदान करे।
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