जीवन में जब साथ निभाने का वादा करने वाला ही बीच मझधार छोड़ दे, तब संघर्ष और जिम्मेदारियां कई गुना बढ़ जाती हैं। ऐसे ही संघर्ष, त्याग और हौसले की मिसाल हैं दूनी के ओसवाल मोहल्ला निवासी मंजूलता बलाई, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में अकेले बेटे का पालन-पोषण कर उसे पुलिस सेवा तक पहुंचाया।
टोंक/दूनी। जीवन में जब साथ निभाने का वादा करने वाला ही बीच मझधार छोड़ दे, तब संघर्ष और जिम्मेदारियां कई गुना बढ़ जाती हैं। ऐसे ही संघर्ष, त्याग और हौसले की मिसाल हैं दूनी के ओसवाल मोहल्ला निवासी मंजूलता बलाई, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में अकेले बेटे का पालन-पोषण कर उसे पुलिस सेवा तक पहुंचाया।
मातृ दिवस के अवसर पर राजस्थान पत्रिका टीम ने मंजूलता के संघर्षमय जीवन को करीब से जाना। मंजूलता ने पति की गलत संगत और बिगड़ी जीवनशैली से परेशान होकर बेटे उत्कर्ष उर्फ चिंटू के भविष्य को संवारने के लिए सामाजिक और पारिवारिक बंधनों से ऊपर उठकर अकेले संघर्ष करने का निर्णय लिया।
विवाह के बाद मंजूलता अपने पीहर बेनपा से ससुराल आवां आई थीं, लेकिन कुछ समय बाद ही पति बनवारी की गलत आदतों और संगत ने उनके सपनों को तोड़ दिया। बाद में दोनों दूनी में किराए के मकान में रहने लगे। इसी दौरान वर्ष 2000 में पुत्र उत्कर्ष का जन्म हुआ।
मंजूलता बताती हैं कि पति ने खुद को बदलने के बजाय पत्नी और एक वर्षीय बेटे को छोड़ दिया और वापस आवां चला गया। इसके बाद उन्होंने बेटे के भविष्य को ही अपना लक्ष्य बना लिया।
जीवन यापन और बेटे की पढ़ाई के लिए मंजूलता ने कपड़ों की सिलाई का काम शुरू किया। उच्च शिक्षा प्राप्त होने के कारण उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना भी शुरू किया। दिन-रात की मेहनत और करीब 25 वर्षों के संघर्ष के बाद उनका सपना तब साकार हुआ, जब बेटे उत्कर्ष चौपदार का चयन राजस्थान पुलिस सेवा में हुआ।
उत्कर्ष ने बीएससी और बीएड की पढ़ाई पूरी करने के बाद भर्ती परीक्षा में सफलता हासिल की। बीकानेर में प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्होंने कोटा शहर पुलिस लाइन में कांस्टेबल पद पर ज्वाइन किया। आज मंजूलता का संघर्ष उन महिलाओं के लिए प्रेरणा बन गया है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानतीं और अपने बच्चों के सपनों को पूरा करने के लिए हर चुनौती का सामना करती हैं।