उदयपुर

जागरूकता और समय पर इलाज से टीबी पर जीत, आदिवासी क्षेत्रों में बदली तस्वीर

उदयपुर संभाग के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में टीबी मरीज अधिक होने के बावजूद जागरूकता, समय पर जांच और सरकारी प्रयासों से इलाज में सुधार हुआ है। स्वास्थ्य विभाग गांव-गांव स्क्रीनिंग, मुफ्त दवा और पोषण सहायता देकर मरीजों की रिकवरी बढ़ा रहा है। महिलाओं, युवाओं और पंचायतों की बढ़ती भागीदारी से टीबी मुक्त अभियान को मजबूती मिल रही है।
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May 29, 2026
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उदयपुर. शहर और आसपास के ग्रामीण व जनजातीय क्षेत्रों में टीबी मरीजों की संख्या भले अधिक हो, लेकिन अब जागरूकता और सरकारी प्रयासों से इस बीमारी के खिलाफ चल रही जंग अब निर्णायक मोड़ पर है। हालात अब तेजी से बेहतर हो रहे हैं। टीबी हॉस्पिटल के अनुसार अस्पताल में आने वाले 55 प्रतिशत मरीज आदिवासी ग्रामीण इलाकों से हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीमों ने गांव-गांव जाकर स्क्रीनिंग, जांच और दवा वितरण का अभियान तेज किया है। पहले जहां मरीज बीमारी छुपाते थे, वहीं अब लोग जांच और इलाज के लिए सामने आने लगे हैं।

समय पर इलाज से बढ़ी रिकवरी

विशेषज्ञों के अनुसार पहले ग्रामीण क्षेत्रों में मरीज देर से अस्पताल पहुंचते थे, लेकिन अब जागरूकता बढ़ने से शुरुआती स्तर पर ही जांच करवाई जा रही है। इससे मरीजों की रिकवरी बेहतर हो रही है। राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीइपी) के तहत मरीजों को मुफ्त जांच, दवाइयां और नियमित मॉनिटरिंग की सुविधा मिल रही है। स्वास्थ्य कार्यकर्ता घर-घर जाकर मरीजों को दवाइयां लेने और इलाज पूरा करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

पोषण सहायता से मिल रहा सहारा

टीबी मरीजों के लिए सरकार की पोषण सहायता योजना भी चलाई जा रही है। इसके तहत मरीजों को पौष्टिक आहार के लिए आर्थिक सहायता दी जा रही है। स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि जनजातीय क्षेत्रों में अब लोग इलाज के साथ पोषण पर भी ध्यान देने लगे हैं। इससे मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत हो रही है और संक्रमण से उबरने में मदद मिल रही है।

महिलाओं और युवाओं में बढ़ी जागरूकता

ग्रामीण क्षेत्रों में महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और आशा सहयोगिनियों की मदद से अब महिलाओं में भी जागरूकता बढ़ी है। पहले महिलाएं बीमारी छिपाकर रखती थीं, लेकिन अब वे जांच और इलाज के लिए स्वयं आगे आ रही हैं। स्कूलों, पंचायतों और गांवों में लगाए जा रहे जागरूकता शिविरों से युवाओं में भी टीबी को लेकर समझ बढ़ी है। लोग अब लगातार खांसी, वजन घटना और कमजोरी को नजरअंदाज नहीं कर रहे।

जनभागीदारी से मजबूत हो रही मुहिम

टीबी मुक्त भारत अभियान में अब स्थानीय संस्थाएं, पंचायतें और सामाजिक संगठन भी सहयोग कर रहे हैं। कई गांवों में स्वास्थ्य विभाग के साथ मिलकर जागरूकता रैलियां और जांच शिविर आयोजित किए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जनभागीदारी बढ़ने से संक्रमण रोकने में मदद मिल रही है और मरीजों में इलाज को लेकर विश्वास भी मजबूत हुआ है।

कुल मरीजों में जनजातीय ग्रामीण हिस्सेदारी

कुल टीबी मरीजों में 55% मरीज ग्रामीण व आदिवासी क्षेत्रों से- प्रमुख क्षेत्र : कोटड़ा, झाड़ोल, सलूंबर, गोगुंदा, खेरवाड़ा

टीबी अब उपचार योग्य बीमारी है। सबसे जरूरी है कि लोग लक्षण दिखने पर जांच में देरी न करें और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार दवा का पूरा कोर्स लें। अधूरा इलाज न केवल मरीज के लिए खतरा बढ़ाता है, बल्कि संक्रमण फैलने की आशंका भी बढ़ा देता है। जागरूकता, समय पर पहचान और नियमित उपचार ही टीबी मुक्त समाज की सबसे मजबूत नींव हैं।

डॉ. मनोज आर्य, अधीक्षक, टीबी एवं चेस्ट अस्पताल

Updated on:
29 May 2026 06:53 pm
Published on:
29 May 2026 06:53 pm