
उदयपुर. शहर की जल धरोहर पर मंडरा रहे खतरों को लेकर हाईकोर्ट ने न्यायिक निगरानी शुरू कर दी है। अदालत ने रूपसागर तालाब की वर्षों से लंबित सीमांकन प्रक्रिया, मदार नहर की बार-बार सामने आ रही कमजोरियों, झीलों में बढ़ते प्रदूषण, अतिक्रमण, अवैध निर्माण और जल निकायों के आसपास चल रही विकास गतिविधियों को गंभीर पर्यावरणीय चिंता का विषय मानते हुए राज्य सरकार और सभी संबंधित विभागों से विस्तृत स्थिति रिपोर्ट मांगी है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उदयपुर की झीलें, तालाब, नहरें, फीडर चैनल, आर्द्रभूमि और जलग्रहण क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़े पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं और इनके किसी भी घटक में हस्तक्षेप पूरे झील नेटवर्क की पारिस्थितिकी स्थिरता को प्रभावित कर सकता है।
तालाब सीमाओं की फिर होगी पड़तालहाईकोर्ट ने रूपसागर तालाब को लेकर विशेष चिंता जताई है। न्यायालय ने माना कि लंबे समय से झील के वास्तविक क्षेत्रफल, पेटे और सीमा को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। ऐसे में संबंधित विभागों को निर्देश दिए गए हैं कि रूपसागर तालाब के राजस्व रिकॉर्ड, सीमांकन कार्यवाही, भू-अभिलेख, वर्तमान भौतिक स्थिति और झील के वास्तविक विस्तार की जांच कर रिपोर्ट पेश की जाए। हाईकोर्ट ने यह भी जानना चाहा है कि झील के संरक्षण और उसके जलग्रहण क्षेत्र की सुरक्षा के लिए अब तक क्या कार्रवाई हुई और सीमा निर्धारण प्रक्रिया किस स्तर पर पहुंची है।
मदार नहरः बदहाली पर भी सख्त नजर
बार-बार मरम्मत के बावजूद मदार नहर की दीवारों और संरचना में सामने आ रही खामियों को भी हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया है। अदालत ने माना कि नहर की कमजोर स्थिति मानसून के दौरान दुर्घटनाओं, बाढ़ जैसी स्थितियों और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती है। जल संसाधन विभाग को नहर की वर्तमान स्थिति, रखरखाव व्यवस्था और भविष्य की सुरक्षा योजना पर विस्तृत रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए हैं।
झीलों के पानी की होगी वैज्ञानिक जांच
हाईकोर्ट ने राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सभी प्रमुख झीलों और जल निकायों की जल गुणवत्ता का वैज्ञानिक आकलन करने के निर्देश दिए हैं। बोर्ड को प्रदूषण स्तर, जल की गुणवत्ता, पर्यावरणीय जोखिम, आवश्यक सुधारात्मक उपाय तथा प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ की गई कार्रवाई का पूरा ब्योरा मांगा है।
जीआइएस मैपिंग और डिजिटल रिकॉर्ड के निर्देश
झीलों के संरक्षण के लिए आधुनिक तकनीक के उपयोग पर जोर देते हुए न्यायालय ने सभी प्रमुख जल निकायों की जीआइएस मैपिंग, डिजिटल रिकॉर्ड, सीमांकन नक्शे और राजस्व अभिलेखों की जानकारी मांगी है। अदालत ने झीलों और जल निकायों के भौगोलिक विस्तार, स्वामित्व स्थिति, जलवैज्ञानिक संपर्क और संरक्षण उपायों का डिजिटल दस्तावेज सुनिश्चित करने को कहा है।
अतिक्रमण, अवैध निर्माण की पूरी जानकारी मांगी
न्यायालय ने झीलों, नहरों, जल निकायों और जलग्रहण क्षेत्रों को प्रभावित करने वाले सभी अतिक्रमण, अवैध निर्माणों, भूमि उपयोग परिवर्तन और विकास गतिविधियों का विवरण तलब किया है। साथ ही पूछा कि अब तक कितने अतिक्रमण हटाए गए, कितनी कार्रवाई हुई और प्रभावित क्षेत्रों को मूल स्वरूप में बहाल करने के लिए क्या कदम उठाए गए।---
हाईकोर्ट ने फतहसागर झील, रूपसागर तालाब और अन्य पारिस्थितिकी रूप से संवेदनशील जल निकायों के आसपास संचालित या प्रस्तावित विकास, व्यावसायिक और आधारभूत संरचना परियोजनाओं का भी पूरा ब्योरा मांगा है। अदालत ने पूछा कि इन परियोजनाओं के लिए कौन-कौन से सुरक्षा उपाय अपनाए गए तथा उनका झील पारिस्थितिकी और पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
13 प्रमुख झीलें और पूरा जल नेटवर्क जांच के दायरे में
न्यायालय ने पिछोला, फतहसागर, स्वरूपसागर, रंगसागर, रूपसागर तालाब, दूधतलाई, गोवर्धन सागर, बड़ी झील, उदयसागर, मदार झील, बड़ा मदार, छोटा मदार और कुम्हरिया तालाब सहित सभी प्रमुख जल निकायों की स्थिति रिपोर्ट मांगी है। इनके साथ जुड़े फीडर चैनल, नहरें, प्राकृतिक जल निकासी तंत्र, आर्द्रभूमि और जलग्रहण क्षेत्रों को भी जांच के दायरे में शामिल किया गया है। हाईकोर्ट ने पूछा है कि झीलों और जल निकायों को लेकर कौन-कौन से वैज्ञानिक अध्ययन, पारिस्थितिकी मूल्यांकन, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन और जलवैज्ञानिक सर्वे किए गए हैं। यदि ऐसे अध्ययन हुए हैं तो उनकी प्रतियां और निष्कर्ष भी प्रस्तुत किए जाएं।
जिला कलक्टर को बनाया समन्वयक
न्यायालय ने जिला कलक्टर को पूरी प्रक्रिया का नोडल समन्वयक बनाया है। कलक्टर जल संसाधन विभाग, नगर निगम, उदयपुर विकास प्राधिकरण, वन विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड तथा अन्य संबंधित एजेंसियों से जानकारी एकत्र कर समेकित रिपोर्ट तैयार करेंगे।