
उदयपुर. महाप्रज्ञ विहार में आचार्यश्री शिवमुनिजी ने कहा कि समृद्धि मनुष्य के भीतर समाहित है, लेकिन इसे पाने के लिए वह बाहर भटकता रहता है। धन, दौलत, वैभव में समृद्धि नहीं होती। असल में यह समृद्धि है ही नहीं। संसार के प्रति आकर्षण से मनुष्य को भीतर का ज्ञान नहीं है। समृद्धि तो अरिहन्तों, सिद्धों और सन्तों के पास मिलती है। आपको भी समृद्धि चाहिये तो अरिहन्तों, सिद्धों और सन्तों की शरण में ही आना पड़ेगा। युवाचार्य महेंद्र ऋषि ने कहा कि जैनत्व की सबसे बड़ी निशानी करुणामयी और सात्विक जीवन है। चातुर्मास संयोजक वीरेंद्र डांगी एवं संघ अध्यक्ष ओंकारसिंह सिरोया ने बताया कि इस मौके पर सुमतिप्रकाश महाराज का जन्मोत्सव मनाया गया। महाप्रज्ञ विहार में आचार्य के सान्निध्य में सामूहिक आयम्बिल दिवस का आयोजन हुआ।
इच्छाएं पतन की वजह
हुमड़ भवन में जिन सहस्रनाम विधान पूजन के दौरान धर्मसभा में मुनि धर्मभूषण ने कहा कि मनुष्य की असीम इच्छाएं ही पतन की वजह हैं। सब कुछ छोड़ देने की इच्छाएं शिव बना देती है। इन्सान की जैसी कामना होती है वैसा ही उसका काम होता है। मंजू गदावत ने बताया कि प्रात पूजा, अभिषेक, शांति धारा एवं जिनसहस्रनाम विधान पूजन हुआ। सुमतिलाल दुदावत ने बताया कि इस बीच 108 सौधर्म इन्द्रों की ओर से चमत्कारिक सहस्रनाम विधान हुआ। शाम को मंगल आरती के बाद गरबा हुआ।
मोक्ष कल्याणक आज
भूपालवाड़ी स्थित शीतलनाथ मन्दिर में बुधवार को शीतलनाथ भगवान का मोक्ष कल्याणक दिवस मनाया जाएगा। महामंत्री सुरेश कुमार पदमावत ने बताया कि मुनि धर्मभूषण के सान्निध्य में सभी धार्मिक अनुष्ठान सम्पादित होंगे। इससे पहले मंगलवार शाम को रात्रि जागरण एवं णमोकार महामंत्र एवं भक्तामर पाठ हुआ। 17 अक्टूबर की सुबह 7 बजे मुनि धर्मभूषण के सान्निध्य में भगवान पर पंचामृत एवं महाश्ंातिधारा का आयेाजन होगा। बाद में निर्वाण लाडू चढ़ाने की प्रक्रिया होगी।
जैनशासन की शपथविधि
जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक श्रीसंघ के तत्वावधान में आराधना भवन में पन्यास प्रवर श्रुत तिलक विजय ने धर्मसभा में कहा कि जब तक हमें व्यक्ति की सच्ची पहचान नहीं होती। तब तक हम उसकी महत्ता नहीं समझ पाते। ठीक इसी तरह हम अब तक अरिहंत परमात्मा को सही ढंग से नहीं पहचानते हैं। जब भगवान की सच्ची पहचान होगी। उसी दिन से आपका भगवान के प्रति व्यवहार बदल जाएगा। ऐसे अरिंहत परमात्मा को देव रूप में, उन्हीं की राह पर चलने वाले साधुओं को गुरू के रूप में और उनके बताए मार्ग को धर्म के रूप में स्वीकारना यही सम्यग्दर्शन कहलाता है। जैनशासन में प्रवेश पाने के लिए ये ही शपथविधि है।
धर्मी के लिए मृत्यु महोत्सव
आयड़ वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संस्थान के तत्वावधान में ऋषभ भवन में मुनि प्रेमचंद ने धर्मसभा में कहा कि पापी के लिए मृत्यु कदाच सजा रूप होती है, परंतु धर्मी के लिए तो मृत्यु भी मजा रूप इनाम रूप होती है। जन मानस जब शरीर से आत्मा जुदा होती है। तब उसे मृत्यु कहता है वास्तव में तो मनुष्य जन्मता है तभी से क्षण-क्षण मरण को प्राप्त होता रहता है। संस्थान अध्यक्ष नरेंद्र तलेसरा ने बताया कि मुनि प्रेमचंद के जन्म दिवस एवं महासती चिन्मयश्री के श्रेणी तप (115 दिवसीय) एवं मौन साधना की सम्पूर्ति पर तीन दिवसीय कार्यक्रम के तहत सामूहिक तेला तप आराधना कार्यक्रम के आयोजन हुए।