
उदयपुर। गोवर्धन पूजा पर 35 से अधिक तरह की मौसमी सब्जियों को मिलाकर बनने वाला पारंपरिक 'अन्नकूट' सदियों से धरती की जैव-विविधता और फसल की भरपूरता के प्रति आभार का प्रतीक रहा है। लेकिन, आधुनिक खेती की होड़ में थाली का यह अन्नकूट अब खेतों से लगभग गायब हो चुका है। मक्का, गेहूं और सोयाबीन जैसी दो-तीन नकदी फसलों तक सिमटी मोनो क्रॉपिंग (एकल खेती) ने न केवल मिट्टी का दम घोंटा है, बल्कि अनियमित मानसून के दौर में किसानों को आर्थिक जोखिम में भी धकेल दिया है।
इस संकट के बीच मेवाड़ अंचल के खेतों में एक नई कृषि-क्रांति आकार ले रही है। आइआइटी मुम्बई से पढ़ाई पूरी कर खेती की राह चुनने वाली अशिमा गोयल सिराज और उनकी टीम स्थानीय किसानों के साथ मिलकर खेतों में वही पारंपरिक विविधता लौटा रही है, जो कभी अन्नकूट की थाली का आधार हुआ करती थी।
इस वर्ष जब मानसून की बेरुखी ने पूरे क्षेत्र को संकट में डाल दिया, तब मिट्टी और मौसम के तकनीकी आंकड़ों के आधार पर किसानों को पारंपरिक मक्का की जगह मूंगफली व दलहन जैसी कम पानी वाली फसलें लगाने की सलाह दी गई। परिणाम उम्मीद से बेहतर रहे। जहां पारंपरिक फसलों पर निर्भर किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ा, वहीं फसल विविधीकरण अपनाने वाले खेतों में हरियाली बनी रही।
खेतों की यह विविधता अब केवल पैदावार तक सीमित नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी के संस्कारों में भी उतर रही है। बड़गांव स्थित राजकीय बालिका उच्च माध्यमिक विद्यालय की छात्राएं परिसर की खाली भूमि पर बिना किसी रासायनिक खाद के प्राकृतिक तरीके से सब्जियां उगा रही हैं। वहीं, सप्ताहांत पर बच्चे खेतों में आकर खुद क्यारियां तैयार करते हैं और बीजों के अंकुरण को डायरी में दर्ज करते हैं।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि रासायनिक खादों के अंधाधुंध उपयोग और एकल फसल चक्र ने मिट्टी की जलधारण क्षमता को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। मिश्रित खेती मिट्टी को प्राकृतिक पोषण देती है और भूजल स्तर को स्थिर रखती है। अन्नकूट का सांस्कृतिक संदेश केवल एक दिन की पूजा तक सीमित नहीं है, यह संदेश है कि खेतों में जितनी विविधता होगी, किसान और पर्यावरण दोनों उतने ही सुरक्षित रहेंगे।