Highlights- बुलंदशहर जिले का सैदपुर गांव है लोगों के लिए मिसाल- सैदपुर गांव के 117 बेटे देश के लिए कर चुके हैं प्राण न्यौछावर- गांव में युवकों को दी जाती आर्मी में भर्ती होने के लिए विशेष ट्रेनिंग
बुलंदशहर. भारतीय आर्मी आज अपना 72वां स्थापना दिवस मना रही है। इस मौके पर आज हम आपको ऐसे गांव के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके हर घर से कोई ना कोई फौज में है। इतना ही देश की रक्षा में इस गांव के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है, क्योंकि इस गांव के 117 बेटों ने देश के लिए अपनी कुर्बानी दी है। इस गांव के बच्चों में देश सेवा का ऐसा जज्बा है, जिसे आप भी सलाम करेंगे। बता दें कि वेस्ट यूपी के इस गांव का नाम सैदपुर है।
दरअसल, सैदपुर गांव उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के बीबीनगर थाना क्षेत्र में आता है। गांव सैदपुर की आबादी करीब 30 हजार है। यहां बहुत से शहीदों की मूर्तियां लगी हैं। यहां रहने वाले पूर्व फौजी कहते हैं कि सेना में सबसे ज्यादा शहादत देने वालों में सैदपुर का नाम सबसे आगे है। वह कहते हैं कि हमारी आर्मी में सैदपुर बटालियन काफी प्रसिद्ध है। गांव के रहने वाले कुशलपाल सिंह कहते है कि हमारे गांव की खास बात ये है कि यहां के हर घर से से कोई न कोई फौज में जरूर है। कुछ घर तो ऐसे हैं, जिनके सभी लोग फौज में हैं। इतना ही नहीं इस गांव की कई लड़कियां भी आर्मी में हैं। इसका सबसे बड़ा कारण गांव में ही युवकों को आर्मी की ट्रेनिंग दिया जाना है। यहां रोजाना दर्जनों युवकों को सेना में जाने की ट्रेनिंग दी जाती है।
विश्वयुद्ध के दौरान 29 सैनिक हुए थे शहीद
बता दें कि सैदपुर के ग्रामीणों में शौर्य, साहस और देश के लिए प्राण न्यौछावर करने की परंपरा काफी पुरानी है। आजादी से पहले भी इस गांव के लोगों ने अहम योगदान दिया था। यहां के रहने वाले बुजुर्ग बताते हैं कि विश्वयुद्ध के दौरान 1914 में सैदपुर के 155 सैनिक जर्मनी गए थे, जिनमें से 29 शहीद हो गए थे। इसके बाद करीब 100 जवान वहीं बस गए। उन्होंने वहां का नाम जाटलैंट रख दिया था। सैदपुर गांव में सिरोही और अहलावट जाट रहते हैं। सैदपुर के लिए सेना स्पेशल भर्ती भी करती है।
इंदिरा गांधी खुद शहीद का अस्थि कलश लेकर पहुंची थी सैदपुर
1962, 1965, 1971 और कारगिल के युद्ध में भी सैदपुर के लड़ाकों ने अहम भूमिका निभाई थी। 1965 के युद्ध में सैदपुर के कैप्टन सुखबीर सिरोही शहीद हुए थे। बुजुर्ग बताते हैं कि उस दौरान खुद इंदिया गांधी अस्थि कलश लेकर सैदपुर पहुंची थीं। इसके बाद सुखबीर सिंह सिरोही को परमवीर चक्र से नवाजा गया था। वहीं, 1971 के युद्ध में सैदपुर के दो सिरोहियों को वीरगति प्राप्त हुई थी। इसके अलावा सैदपुर के दर्जनों जवानों को मेडलों से नवाजा जा चुका है।