
टिप्पणी/अभिषेक श्रीवास्तव
हो सकता है यह तस्वीर देख आप सहम जाएं, कुछ देर के लिए ठहर जाएं। आपके अंदर तरह-तरह के सवाल उठें, लेकिन फिर भी जरूरी है कि यह आपसे साझा की जाए। यह सिर्फ एक हादसे या कुछ मौतों की तस्वीर नहीं है। यह तस्वीर है उस भ्रष्ट सिस्टम की, जिसने 18 लोगों को मौत की नींद सुला दिया। यह तस्वीर है निर्लज्ज सरकारों के रिश्वतखोर तंत्र की, जो रुपयों की बंदरबांट और अपने निजी स्वार्थ के लिए किसी की जान का सौदा करने से भी पीछे नहीं हटता।
दरअसल, बनारस में 15 मई को जो हुआ वह कोई दैवीय आपदा अथवा अचानक घटित कोई हादसा नहीं था। यह रक्तरंजित उदाहरण था तीन सरकारों के कामकाज का। जब चौकाघाट फ्लाईओवर का निर्माण शुरू हुआ तो बसपा की सरकार थी। मायावती के शासनकाल में चौकाघाट फ्लाईओवर बना, लेकिन इसकी लैंडिंग रोडवेज डिपो के पास करा दी गई. यह गलती शहर को भीषण जाम की जद में ले आई, तब इसके विस्तार की बात शुरू हुई, जबकि यह काम पहले ही हो जाना चाहिए था। फिर 2012 में अखिलेश यादव के सत्ता में आते ही फ्लाईओवर के विस्तार पर मुहर लगी और बजट आवंटित किया गया, लेकिन कमीशनबाजी और बंदरबांट के चक्कर में ब्रिज का निर्माण कछुआ गति से चला, इस बीच उनकी सरकार चली गई। 2017 में भाजपा सरकार ने आते ही तेजी दिखाई या यूं कहें कि 2019 के विजन के चक्कर में मानकों की अनदेखी का काम शुरू हुआ। पिछले एक साल में फ्लाईओवर को लेकर तमाम सवाल खड़े हुए। फ्लाईओवर के पिलर हिलने का मामला सामने आया, सर्विस लेन पर बदइंतजामी का मुद्दा उठा, लेकिन दावों और आश्वासनों में साल बीत गया। भ्रष्ट और धृष्ट प्रशासन के कान पर जूं तक नहीं रेंगी, चीज़ें नजरअंदाज होती रहीं। फ्लाईओवर के विस्तार पर कुल 77.41 करोड़ रुपए का बजट स्वीकृत हुआ और इसे हर हाल में दिसंबर 2017 में पूरा करना था, लेकिन सिर्फ 27 प्रतिशत काम ही हो पाया और फिर शासन ने इसकी मियाद बढ़ाकर मार्च 2018 कर दिया। काम में कुछ तेजी आई और यह 50 प्रतिशत के आंकड़े पर जा पहुंचा। इस बीच दो दिन पहले प्रशासिनक अधिकारियों ने दौरा किया और निर्देश दिया कि मई के अंत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आने से पहले इतना काम पूरा कर लिया जाए, जो देखने और दिखाने में अच्छा लगे। प्रशासन अभी इस ब्रिज पर लीपापोती का काम करा ही रहा था कि फ्लाईओवर का एक हिस्सा गिरा और कुछ देर के लिए बनारस जैसे जिंदा शहर की सांसें थम गईं।
ऐसे में सवाल तो उठना लाजमी है कि हम बनारस को बनाना क्या चाहते हैं। विकास के नाम पर विनाश का जो खेल हो रहा है उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। अरबों रुपयों की योजनाओं में जिस तरह लोगों की सुरक्षा को नजरअंदाज किया जा रहा है, उसका जिम्मेदार कौन है। सेतु निगम के इस महत्वपूर्ण प्रोजक्ट में जिस अफसर और ठेकेदार ने घोर लापरवाही बरती, मानकों की अनदेखी की. उन पर हत्या जैसी धाराओं में मुकदमा क्यों नहीं हो ? प्रशासन के वे आला अधिकारी भी, जो प्रतिदिन उस रास्ते से गुजरते रहे और सबकुछ देखकर आंखें मूंदे रहे, उनकी जवाबदेही क्यों नहीं। ...या प्रदेश सरकार के बड़े-बड़े मंत्री जो प्रतिदिन काशी को क्योटो बनाने की बात करते हैं वे जिम्मेदार नहीं? आखिर उन 18 लोगों की मौत का जिम्मेदारी कौन लेगा, शासन-प्रशासन या फिर अन्य हादसों की तरह ये मौतें भी जांच की फाइलों में दफ़न हो जाएंगी। दुष्यंत कुमार की चंद लाइनें आज बहुत मौजू हैं ...
तुम्हारे पांव के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं
मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूं
मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं।