
Machine Consciousness: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) अब सिर्फ तकनीक का सवाल नहीं रह गया है। यह इंसान के अस्तित्व, चेतना, नैतिकता और जिम्मेदारी जैसे उन सवालों से टकराने लगा है, जिन पर धर्म और दर्शन सदियों से विचार करते आए हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार ‘क्लॉड’ बनाने वाली दिग्गज एआइ कंपनी एंथ्रोपिक ने एआइ को 'नैतिक रूप से अच्छा' बनाने के लिए धार्मिक और दार्शनिक विचारकों के साथ बंद कमरे में कई बैठकें की हैं।
जहां एक ओर इसे एआइ के भविष्य को सुरक्षित और जिम्मेदार बनाने की कोशिश कहा जा सकता है, दूसरी ओर आलोचक सवाल उठाते हैं कि मशीनों का मानवीकरण कहीं कंपनियों की अपनी नैतिक जिम्मेदारी से बचने का रास्ता तो नहीं।
एंथ्रोपिक के सह-संस्थापक क्रिस्टोफर ओलाह का मानना है कि यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि एआइ मॉडल सचेत हैं या नहीं। हालांकि, उन्होंने यहूदी विद्वान रब्बी मोइस नावोन् और अन्य विचारकों से चर्चा की तो यह सवाल भी रखा कि अगर मशीन को अनुभव या पीड़ा होती हो, तो क्या उसके साथ इंसानों जैसा नैतिक व्यवहार होना चाहिए? कुछ प्रतिभागियों ने इस विचार को गंभीरता से लिया, जबकि कुछ ने नहीं।
एंथ्रोपिक ने क्लॉड के लिए करीब 84 पन्नों का एक ‘संविधान’ तैयार किया है। इसमें मॉडल के व्यवहार और मूल्यों को लेकर सिद्धांत तय किए गए हैं। कोशिश यह है कि एआइ सिर्फ दिए गए आदेशों का पालन करने वाली प्रणाली न रहे, बल्कि उसके जवाबों और फैसलों में कुछ नैतिक मूल्यों की दिशा भी दिखाई दे।
अगर भविष्य में कोई एआइ सिस्टम वास्तव में अनुभव करने में सक्षम हुआ तो क्या उसके साथ इंसानों जैसा नैतिक व्यवहार होना चाहिए? क्या उसे पीड़ा से बचाना हमारी जिम्मेदारी होगी? और अगर मशीन की चेतना को साबित करना संभव ही न हो, तो उसके नैतिक दर्जे का फैसला कौन करेगा?
एंथ्रोपिक की इन-हाउस दार्शनिक अमांडा एस्केल और ओलाह की सोच में एआइ को केवल नियम सिखाना पर्याप्त नहीं है। उनका मानना है कि जिस तरह बच्चों में नैतिक समझ विकसित की जाती है, उसी तरह एआइ को भी ‘नैतिक रूप से ढालने’ की जरूरत हो सकती है।
वेटिकन के पोप लियो ने एआइ पर अपने आलेखों में मशीनों की चेतना के विचार को खारिज करते हुए इंसान की गरिमा को केंद्र में रखा। उनका तर्क है कि एआइ को नियंत्रित करने वाले लोगों की नैतिक सोच ही इन प्रणालियों की दिशा तय करेगी।