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Hindu Attacks: बांग्लादेश चुनाव से पहले सुसेन चंद्र की हत्या और जलते घर, 10 बड़ी घटनाओं से हिला पूरा देश

Persecution: बांग्लादेश में आम चुनाव से पहले सुसेन चंद्र की हत्या, 10 जगहों पर हिंदुओं पर हमले। मंदिर तोड़े गए और घरों में आगजनी, अल्पसंख्यक समुदाय में भारी दहशत।

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Feb 10, 2026
बांग्लादेश में चुनावी हिंसा। ( फोटो: AI)

Sushen Chandra: बांग्लादेश में आम चुनाव की तारीखें (Bangladesh Election 2026) जैसे-जैसे नजदीक आ रही हैं, देश का राजनीतिक तापमान बढ़ने के साथ-साथ सांप्रदायिक हिंसा का ग्राफ भी तेजी से ऊपर जा रहा है। "लोकतंत्र के उत्सव" के बजाय, यह समय वहां के अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के लिए एक "डरावने सपने" में तब्दील हो गया है। ताजा मामला सुसेन चंद्र (Sushen Chandra) की निर्मम हत्या (Attacks on Hindus) का है, जिसने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि बांग्लादेश में सत्ता चाहे किसी की भी हो, हिंदुओं की सुरक्षा हमेशा एक सवालिया निशान बनी रहती है। पुलिस रिपोर्ट और स्थानीय सूत्रों के अनुसार, सुसेन चंद्र को (Sushen Chandra Murder)उनके घर के पास ही निशाना बनाया गया। उपद्रवियों ने धारदार हथियारों से उन पर हमला किया। इस नृशंस हत्या को महज एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि चुनाव से पहले "डर का माहौल" (Bangladesh Violence) बनाने की साजिश के रूप में देखा जा रहा है। मकसद साफ है-अल्पसंख्यकों को इतना डरा दो कि वे मतदान केंद्रों तक जाने की हिम्मत न जुटा सकें।

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हिंसा का पैटर्न: चुन-चुन कर हमले

बांग्लादेश में चुनावी हिंसा का एक पैटर्न रहा है। जमात-ए-इस्लामी और अन्य कट्टरपंथी संगठन अक्सर ग्रामीण इलाकों में कमजोर हिंदू परिवारों को निशाना बनाते हैं। कभी ईशनिंदा के झूठे आरोप लगाकर तो कभी जमीनी विवाद का बहाना बनाकर हमले किए जाते हैं। सुसेन चंद्र की हत्या अकेली घटना नहीं है; पिछले एक महीने में देश के अलग-अलग हिस्सों से आगजनी, मूर्ति भंजन और मारपीट की खबरें लगातार आ रही हैं।

बांग्लादेश में चुनाव से पहले हिंदुओं पर किए गए हमले: एक नजर

तारीख (2026)स्थानघटना
8 फरवरीरंगपुरसुसेन चंद्र की हत्या (घर के बाहर धारदार हथियार से हमला।)
6 फरवरीखुलनामंदिर में तोड़फोड़ (मूर्तियों को खंडित किया गया।)
5 फरवरीचटगांवदीपक साहा की दुकान में लूटपाट और आगजनी।
3 फरवरीलालमोनिरहाटशिक्षक के परिवार पर हमला, महिलाओं से अभद्रता।
1 फरवरीबरिसालगौरव दास को चाकू मारा (चुनावी रैली के बाद।)
30 जनवरीदिनाजपुरश्मशान भूमि पर स्थानीय दबंगों का कब्जा।
28 जनवरीमैमनसिंहस्कूली छात्रा के अपहरण की कोशिश, पिता की पिटाई।
26 जनवरीफेनीराधा-कृष्ण मंदिर पर पेट्रोल बम फेंका गया।
24 जनवरीसिलहटअनंत कुमार पर सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर भीड़ का हमला।
22 जनवरीनोआखाली12 हिंदू घरों में सुनियोजित आगजनी।
(स्रोत: मीडिया रिपोर्ट्स)

प्रशासन की लाचारी या मौन सहमति ?

अंतरराष्ट्रीय दबाव के बावजूद, बांग्लादेशी प्रशासन इन हमलों को रोकने में विफल रहा है। मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि पुलिस कार्रवाई करने में देरी करती है, जिससे उपद्रवियों के हौसले बुलंद होते हैं। कई मामलों में तो पीड़ित परिवारों की एफआईआर (FIR) तक दर्ज नहीं की जाती।

हिंदू बौद्ध ईसाई एकिया परिषद: संगठन के महासचिव राणा दासगुप्ता ने कड़े शब्दों में कहा, "अगर सरकार हमें सुरक्षा नहीं दे सकती, तो हम संयुक्त राष्ट्र (UN) से हस्तक्षेप की मांग करेंगे। चुनाव के नाम पर हमारे लोगों की बलि स्वीकार नहीं की जाएगी।"

अंतरराष्ट्रीय समुदाय: एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बांग्लादेश सरकार से तत्काल प्रभाव से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और सुसेन चंद्र के हत्यारों को गिरफ्तार करने की मांग की है।

विरोध प्रदर्शन: सुसेन चंद्र की हत्या के विरोध में आज ढाका के शाहबाग चौराहे पर अल्पसंख्यक संगठनों ने विशाल मशाल जुलूस निकालने का ऐलान किया है।

पुलिस का बयान: स्थानीय पुलिस प्रमुख ने दावा किया है कि सुसेन चंद्र हत्याकांड में दो संदिग्धों को हिरासत में लिया गया है, लेकिन मुख्य आरोपी अभी भी फरार है।

जनसांख्यिकीय बदलाव (Demographic Shift) का खतरा

बांग्लादेश में लगातार हो रही हिंसा का दूरगामी परिणाम 'पलायन' के रूप में सामने आ रहा है। 1947 में जहां बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) में हिंदुओं की आबादी लगभग 28% थी, वह अब घट कर 8% से भी कम रह गई है। डर के कारण सीमावर्ती जिलों के कई परिवार अपनी पुश्तैनी जमीनें औने-पौने दाम पर बेचकर भारत या अन्य देशों में शरण लेने को मजबूर हो रहे हैं। यह हिंसा केवल शारीरिक नहीं, बल्कि एक समुदाय को उसकी जड़ों से उखाड़ने की मनोवैज्ञानिक लड़ाई भी है।

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