
यूरोप अब चीन के खिलाफ खुलकर सामने आ गया है। तिब्बत, उइगर और दक्षिणी मंगोलिया में रहने वाले अल्पसंख्यक समुदायों की संस्कृति, भाषा और धर्म को खत्म करने वाले चीन के नए कानून पर यूरोपीय देश सख्त हो गए हैं।
चीन का नया 'एथनिक यूनिटी एन्ड प्रोग्रेस लॉ' 1 जुलाई से लागू हो गया है, लेकिन इसके खिलाफ यूरोप की नाराजगी दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। यूरोप के संसद में इस कानून की जमकर आलोचना की गई।
यूरोपीय सांसदों ने कहा कि यह कानून जबरन तिब्बतियों और दूसरे अल्पसंख्यकों को चीनी संस्कृति में घोलने की कोशिश है। उन्होंने साफ कहा कि दलाई लामा का उत्तराधिकारी चुनने का फैसला सिर्फ धार्मिक मामला है। इसमें चीनी सरकार को कोई दखल नहीं देना चाहिए।
कई सांसदों ने आरोप लगाया कि यह कानून अल्पसंख्यक भाषाओं पर पाबंदी लगा रहा है, पुरानी परंपराओं को तोड़ रहा है और मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रहा है।
उधर, यूरोपीय आयोग की तरफ से कमिश्नर हदजा लाहबिब ने भी तिब्बत में मानवाधिकार स्थिति पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने धार्मिक आजादी, तिब्बती संस्कृति और पहचान बचाने पर जोर दिया।
साथ ही 11वें पंचेन लामा की मौजूदा स्थिति और जगह के बारे में चीन से पारदर्शिता की मांग की। उन्होंने चीन से सीधे शब्दों में पूछा पंचेन लामा कहां हैं? इसका जवाब देना होगा।
यूरोपीय संसद के अलावा नीदरलैंड, फ्रांस और बेल्जियम जैसे देशों की संसदों में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई है। इन देशों के सांसदों ने यूरोपीय संघ से तिब्बत पर एक विशेष प्रतिनिधि नियुक्त करने और चीन के साथ मजबूत कूटनीतिक बातचीत की मांग की है। वे चाहते हैं कि तिब्बती लोगों के सांस्कृतिक और धार्मिक अधिकारों की बेहतर तरीके से रक्षा की जाए।
यूरोपीय संघ ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की 62वीं बैठक में भी इस कानून पर चिंता जताई थी। खासतौर पर इसके संभावित विदेशी प्रभावों को लेकर सवाल उठाए गए। केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (सीटीए) के अनुसार, यूरोप अब इस मुद्दे पर और ज्यादा समन्वय के साथ आगे बढ़ना चाहता है।