
General Zia ul Haq Plane Crash Story: 17 अगस्त, 1988 को पाकिस्तान को एक खबर मिलती है और हर तरफ सन्नाटा पसर जाता है। पूरा मुल्क इस आशंका में डूब जाता है कि आगे क्या होगा? बेनजीर भुट्टो पार्टी की मीटिंग में व्यस्त होती हैं, तभी उनकी सेक्रेटरी फरीदा पहुंचती हैं और उनके हाथ में कागज का एक टुकड़ा थमा देती हैं। जैसे ही बेनजीर उसे खोलती हैं, उनके होश उड़ जाते हैं। भुट्टो को समझ नहीं कि उन्हें कैसे रिएक्ट करना चाहिए। उस कागज के टुकड़े पर लिखा था - एक पत्रकार ने अभी फोन करके बताया है कि एक V-VIP प्लेन गायब हो गया है।
बेनजीर भुट्टो की आत्मकथा ‘डॉटर ऑफ डेस्टिनी’ में लिखा है- मैंने फरीदा से पूछा, इसका क्या मतलब है? उसने धीरे से कहा, यह जनरल जिया का प्लेन है। मुझे यकीन नहीं हो रहा था किजनरल जिया वाकई मारे गए? इसके बजाए, मुझे लगा कि वह भाग गए हैं; मुझे याद आया कि उन्होंने ठीक एक महीने पहले अपने और अपने परिवार के लिए इम्युनिटी (सुरक्षा की गारंटी) के बदले आम चुनाव कराने का प्रस्ताव दिया था। मैं विश्वास नहीं कर पा रही थी कि जिया का दौर खत्म हो गया है? मैंने अपनी सेक्रेटरी से कहा, उस पत्रकार को फोन लगाओ। पत्रकार ने घबराते हुए अपनी बात दोहराई। उसने कहा, जनरल जिया का प्लेन गायब हो गया है। रेडियो संपर्क टूट गया है। मैंने ज़ोर देकर पूछा, गायब होने का क्या मतलब है? क्या प्लेन ईरान, भारत या अफगानिस्तान चला गया है? क्या जिया अपनी मर्ज़ी से गए हैं या प्लेन हाईजैक हो गया है? क्या जानकारी है? वह बेचारा इतना डरा हुआ था कि ठीक से कुछ बता भी नहीं पा रहा था। बस इतना कहा कि आज दोपहर प्लेन इस्लामाबाद वापस नहीं पहुंचा। तीन घंटे पहले उड़ान भरने के बाद से कोई रेडियो संपर्क नहीं हुआ है।
पत्रकार के फोन के बाद एक और फोन आया, यह फोन फ्रंटियर में रहने वाले एक पूर्व जनरल और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के सदस्य का था। उन्होंने कहा - कुछ गड़बड़ है। सेना हरकत में आ गई है। मैंने उनसे पूछा- क्या यह सेना की दोस्ताना हरकत है या दुश्मनी भरी हरकत? मैंने सोचा कि हो सकता है कि ज़िया ने भागने से पहले सेना को सत्ता सौंप दी हो या सेना को देश का कंट्रोल लेने का आदेश दिया गए हों। पार्टी सदस्य ने कहा, अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी।
एक अन्य पार्टी सदस्य ने बताया कि पाकिस्तान के पूर्वी हिस्से में बहावलपुर के एक मिलिट्री बेस से लौटते समय जनरल ज़िया की प्लेन क्रैश में मौत हो गई है। उनके साथ प्लेन में सवार सभी जनरलों की भी मौत हो गई है। लेकिन मैं अभी भी यकीन नहीं कर पा रही थी। इतने सालों के डर और दर्द के बाद, यह यकीन करना मुश्किल था कि जिया का अस्तित्व ही खत्म हो गया है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि उनका अंत इस तरह होगा।
आखिरकार मुझे यकीन हो गया। मैंने लंदन में अपनी बहन सनम को फोन किया, लेकिन वो घर पर नहीं थी। जब मैंने उसके लिए मैसेज छोड़ा, तो शब्द मेरे गले में अटक गए। मैंने कहा, उसे बता देना कि जनरल जिया मर गए हैं। जैसे ही मैंने ये शब्द कहे, मुझे लगा कि मेरे कंधों से एक बहुत बड़ा बोझ हट गया है। ग्यारह साल के टॉर्चर और उत्पीड़न के बाद, हम आज़ाद हो गए थे। जिया अब हमें कभी नुकसान नहीं पहुंचा सकते थे। एक ऐसे देश में जहां खबरें तंग गलियों और बाज़ारों में बाढ़ के पानी से भी तेज फैलती हैं, लोग पहले से ही जश्न मना रहे थे।
लाहौर में मिठाइयां बिक चुकी थीं। कराची में पान की दुकानों पर मुफ्त में पान मिल रहा था। 70 क्लिफ्टन (बेनजीर का आवास) तक खबर पहुंचने के आधे घंटे के भीतर ही, सैकड़ों लोग गेट के बाहर जमा हो गए और नारे लगाने लगे। मैंने उनसे पूछा, आपको क्रैश के बारे में कैसे पता चला? जवाब मिला - अखबार बेचने वाले चिल्ला रहे थे, जिया मर गया! जिया मर गया! गाड़ी चलाने वाले हॉर्न बजा रहे थे और अपनी कार की खिड़कियां नीचे करके चिल्ला रहे थे– जिया मर गया!
बेनजीर ने किताब में लिखा है- हमें यह खबर सबसे पहले शाम करीब 6 बजे मिली थी। लेकिन रेडियो या टेलीविज़न पर इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई थी। जैसे-जैसे एक घंटा और फिर दूसरा घंटा बीता, मुझे मार्शल लॉ के लौटने का डर सताने लगा। सरकार में बैठे जिया के आदमी 16 नवंबर को होने वाले चुनाव रद्द करना चाहते थे, या कम से कम उन्हें टालना चाहते थे। जिया की मौत और देश में अनिश्चितता के माहौल में, वे सेना को कार्रवाई के लिए मनाने की अच्छी स्थिति में थे। 70 क्लिफ्टन पर तनाव बहुत ज़्यादा था। अफवाहें फैल रही थीं कि उस रात सभी विपक्षी नेताओं को हिरासत में ले लिया जाएगा। हालांकि। रात 8 बजे हमें राहत की सांस मिली जब पता चला कि नागरिक शासन का रास्ता अपनाया जा रहा है। रेडियो पाकिस्तान ने घोषणा की कि सीनेट के पूर्व चेयरमैन गुलाम इसहाक खान, संविधान के अनुसार राष्ट्रपति का पद संभाल रहे हैं। जब गुलाम इसहाक खुद टेलीविज़न पर आए और कहा कि चुनाव तय समय पर होंगे, तो यह पहला संकेत मिला कि सेना देश में लोकतंत्र बहाल करने के लिए प्रतिबद्ध थी।
जनरल जिया उल हक पाकिस्तान के फौजी तानाशाह और राष्ट्रपति थे। जिया के शासनकाल में ही बेनजीर के पिता जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी पर लटकाया गया था। बेनजीर भुट्टो और उनकी मां को भी यातनाएं दी गई थीं। जब जिया की मौत की खबर आई, तो बेनजीर ने राहत की सांस ली और पाकिस्तान को भी एक तानाशाह से मुक्ति मिली, इसलिए मौत पर भी पूरे मुल्क में जश्न बनाया गया।