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अमेरिका-इजरायल युद्ध का खौफ या बगावत का डर ? ईरान में इंटरनेट पर ‘महा-तालाबंदी’, लाखों नौकरियां स्वाहा!

Blackout: : ईरान में लगातार 54वें दिन इंटरनेट ठप है, जिससे लोगों के रोजगार और व्यापार पर गहरा असर पड़ा है। अमेरिका-इजरायल युद्ध और सरकार विरोधी प्रदर्शनों के कारण यह पाबंदी 1272 घंटों से ज्यादा समय से लागू है।

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Apr 22, 2026
ईरान में इंटरनेट ब्लैकआउट । (फोटो : ANI )

Catastrophic digital lockdown: आज के डिजिटल युग में जहां इंटरनेट के बिना एक पल भी गुजारना मुश्किल लगता है, वहीं ईरान में पिछले 54 दिनों से भयानक 'डिजिटल डार्कनेस' यानि इंटरनेट ब्लैकआउट जारी है। इंटरनेट गतिविधियों पर नजर रखने वाली प्रमुख वैश्विक संस्था 'नेटब्लॉक्स' ताजा रिपोर्ट के अनुसार, ईरान में इंटरनेट सेवाएं लगातार 1272 घंटों से अधिक समय से पूरी तरह से ठप पड़ी हुई हैं। यह कोई आम तकनीकी खराबी नहीं है, बल्कि देश के बिगड़ते हालात के लते सरकार की ओर से लगाई गई एक सोची-समझी पाबंदी है। बहरहाल देश की एक बड़ी आबादी पूरी दुनिया से कट चुकी है और उनके पास संचार का कोई ठोस साधन नहीं बचा है।

पाबंदी की मुख्य वजह: प्रदर्शन और युद्ध का साया

इस बड़े इंटरनेट शटडाउन की पृष्ठभूमि इस साल की शुरुआत में ही तैयार हो गई थी। जनवरी के शुरुआती दिनों में ईरान के अंदर सरकार विरोधी प्रदर्शनों ने जोर पकड़ लिया था। इन विरोध प्रदर्शनों की आग और सूचनाओं को तेजी से फैलने से रोकने के लिए प्रशासन ने सबसे पहले इंटरनेट पर शिकंजा कसा। लेकिन हालात तब और भी बेकाबू हो गए जब फरवरी के अंत में अमेरिका और इजरायल के साथ ईरान का सैन्य टकराव (US-Israel war on Iran) शुरू हो गया। बाहरी हमले के खतरे और आंतरिक विरोध के इस दोहरे दबाव ने ईरानी सरकार को इंटरनेट पाबंदियों को चरम पर ले जाने के लिए मजबूर कर दिया।

अर्थव्यवस्था और रोजगार पर गहरी चोट

इस भारी इंटरनेट प्रतिबंध का असर सिर्फ बातचीत या सोशल मीडिया तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसने देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी है। ईरान में लाखों नौकरियां खतरे में पड़ गई हैं और छोटे-बड़े व्यापार पूरी तरह से ठप हो गए हैं। ई-कॉमर्स, फ्रीलांसिंग, ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल लेन-देन पर निर्भर रहने वाले कारोबारियों को हर दिन करोड़ों का नुकसान उठाना पड़ रहा है। देश का व्यापारिक ढांचा जो धीरे-धीरे डिजिटल हो रहा था, वह वापस दशकों पीछे चला गया है।

नागरिकों के 'सूचना के अधिकार' का घोर उल्लंघन

इस 54 दिन लंबे शटडाउन पर वैश्विक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाओं ने इसे नागरिकों के 'सूचना के अधिकार' का घोर उल्लंघन बताया है। आम जनता, जो छिटपुट तरीके से प्रॉक्सी के जरिए अपनी आवाज बाहर निकाल पा रही है, उनमें भारी आक्रोश है। नागरिकों का कहना है कि युद्ध और प्रदर्शनों के बीच वे अपने ही घरों में डिजिटल बंधक बनकर रह गए हैं। वे न तो अपने करीबियों की खैरियत जान पा रहे हैं और न ही व्यापार कर पा रहे हैं।

क्या नीतियां बदलने को मजबूर कर सकता है UN और वैश्विक समुदाय

अब दुनिया भर की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या ईरान सरकार आने वाले दिनों में इस पाबंदी में कोई ढील देगी? अमेरिका-इजरायल के साथ चल रहे तनाव के बीच यह देखना भी अहम होगा कि क्या संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक समुदाय का दबाव ईरान को अपनी नीतियां बदलने पर मजबूर कर सकता है। टेक कम्युनिटी लगातार 'नेटब्लॉक्स' के डेटा और जमीनी हालात की निगरानी कर रही है, ताकि शटडाउन हटने या किसी भी नए डिजिटल प्रतिबंध की जानकारी सामने आ सके।

जब अचानक बढ़ जाती है वीपीएन और सैटेलाइट इंटरनेट की मांग

इस पूरी घटना का एक बड़ा पहलू 'वैकल्पिक संचार की जंग' और 'इन्फॉर्मेशन वारफेयर' है। जब भी किसी देश में इंटरनेट बंद होता है, तो ब्लैक मार्केट में वीपीएन और सैटेलाइट इंटरनेट की मांग अचानक बढ़ जाती है। ईरान के युवा और टेक-एक्सपर्ट दुनिया से जुड़ने के लिए बेहद महंगे और जोखिम भरे विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। इसके साथ ही, इस शटडाउन ने यह भी साबित कर दिया है कि आधुनिक युद्ध अब केवल सीमा पर हथियारों से नहीं लड़े जाते, बल्कि सूचनाओं के प्रवाह को रोककर दुश्मन देश या अपने ही नागरिकों को पंगु बना देना भी युद्ध की रणनीति का एक बहुत बड़ा हिस्सा बन चुका है।

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