ईरान और US-इजरायल के बीच 28 फरवरी से जारी जंग की वजह से पूरे मिडिल ईस्ट में तनाव है। ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच अमेरिका ने मिडिल ईस्ट की तरफ वॉरशिप भेज दिए हैं। क्या है अमेरिका का प्लान, आइए जानते हैं...
Iran and US-Israel Conflict: ईरान-इजरायल संघर्ष के बीच अमेरिका ने बड़ा कदम उठाया है। ईरान-इजरायल तनाव के बीच अमेरिका ने मिडिल ईस्ट की तरफ 3 वॉरशिप भेजे हैं। यह वॉरशिप तेजी से मिडिल ईस्ट की तरफ बढ़ रहे हैं। अमेरिकी वॉरशिप के साथ मरीन सैनिक मिडिल ईस्ट भेजे जा रहे हैं। अमेरिकी वॉरशिप में USS त्रिपोली, USS सैन डिएगो, USS न्यू ऑरलियंस शामिल हैं। इन पर करीब 2200 सैनिक तैनात हैं। ये सभी सैनिक 31वीं मरीन एक्सपेडिशनरी यूनिट (MEU) का हिस्सा हैं। अमेरिका की इस यूनिट को तुरंत एक्शन के लिए तैयार रखा जाता है।
CNN की रिपोर्ट के अनुसार, 3 अमेरिकी वॉरशिप मीडिल ईस्ट की ओर बढ़ रहे हैं। इन युद्धपोतों में USS त्रिपोली, USS सैन डिएगो, और USS न्यू ऑरलियंस शामिल हैं। तीनों वॉरशिप भारतीय तट के पास दक्षिणी हिंद महासागर में हैं और तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। इनमें खासकर USS त्रिपोली एक एम्फीबियस असॉल्ट शिप है, जो मरीन सैनिकों, हेलीकॉप्टर और F-35B जैसे लड़ाकू विमानों को लेकर चलता है।
अमेरिकी वेबसाइट एक्सियोस ने जानकारी दी है कि ट्रंप प्रशासन ने ईरान के खार्ग द्वीप पर कब्जा करने या उसे घेरने की योजना बनाई है। कुछ अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि USS त्रिपोली पर तैनात मरीन सैनिकों का इस्तेमाल ईरान के दक्षिणी तट पर स्थित रणनीतिक द्वीपों पर कब्जा करने के लिए किया जा सकता है। अमेरिका इन रणनीतिक द्वीपों पर कब्जा करके ईरान पर जहाजों पर संभावित हमले रोकने के लिए दबाव बना सकता है।
ईरान के लिए खार्ग द्वीप बेहद अहम है क्योंकि यहां से उसका करीब 90 प्रतिशत कच्चा तेल निर्यात होता है। यह द्वीप ईरान के तट से लगभग 15 मील दूर है। अगर अमेरिका इस द्वीप पर कब्जा करता है या नाकाबंदी करता है तो वह ईरान पर होर्मुज स्ट्रेट को खोलने का दबाव बना सकता है। हालांकि, इस योजना में बड़ा खतरा भी है।
अगर अमेरिका खार्ग द्वीप पर कब्जा करता है तो उसके सैनिक सीधे हमलों के निशाने पर होंगे। इसके अलावा अमेरिका खार्ग द्वीप के जरिए अपने युद्धपोतों और विमानों को होर्मुज स्ट्रेट में तैनात कर सकता है, ताकि जहाजों की सुरक्षा की जा सके। अमेरिका का खार्ग द्वीप पर हमला करने का सीधा मकसद ईरान की आर्थिक ताकत को कमजोर करना है, ताकि वह हिजबुल्लाह, हूतियों और हमास जैसे प्रॉक्सी गुटों को फंड न दे सके।