Islamabad: ईरान और पाकिस्तान के विदेश मंत्रियों ने फोन पर बातचीत कर क्षेत्रीय तनाव और इस्लामाबाद में संभावित अमेरिका-ईरान वार्ता पर चर्चा की है। इस कूटनीतिक पहल का मुख्य उद्देश्य मध्य पूर्व में शांति बहाल करना और दोनों देशों के बीच समन्वय बढ़ाना है।
Foreign Ministers: ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे कूटनीतिक तनाव के बीच एक बड़ी और अहम खबर सामने आई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची और पाकिस्तान के विदेश मंत्री इस्हाक डार के बीच हाल ही में एक महत्वपूर्ण फोन कॉल पर बातचीत हुई है। ईरानी समाचार एजेंसियों ने भी इस बातचीत की पुष्टि की है। यह फोन कॉल ऐसे समय में हुई है जब पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच नए दौर की बातचीत होने की अटकलें लगाई जा रही हैं।
हालांकि, इस्लामाबाद में होने वाली इस संभावित अमेरिका-ईरान वार्ता को लेकर अभी भी अनिश्चितता का माहौल है। किसी भी पक्ष ने आधिकारिक तौर पर बैठक की तारीख या समय की घोषणा नहीं की है। लेकिन दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच हुई इस फोन कॉल ने इन अटकलों को और तेज कर दिया है कि पाकिस्तान इस पूरे मामले में एक बड़े मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है।
मध्य पूर्व में जारी भारी तनाव के बीच इस बातचीत को बेहद अहम माना जा रहा है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले प्रशासन और ईरान के बीच रिश्ते काफी तल्ख रहे हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच सीधी बातचीत होना किसी चमत्कार से कम नहीं है। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर इस्लामाबाद में यह बैठक सफल होती है, तो यह वैश्विक शांति और मध्य पूर्व की स्थिरता के लिए एक बहुत बड़ा कदम साबित हो सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान की भूमिका बेहद दिलचस्प है। एक तरफ पाकिस्तान की सीमा ईरान से लगती है और दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक संबंध रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इस्लामाबाद के अमेरिका के साथ भी रणनीतिक और आर्थिक हित जुड़े हुए हैं। ऐसे में पाकिस्तान दोनों पक्षों को एक मेज पर लाने के लिए एक तटस्थ जमीन प्रदान करने की कोशिश कर रहा है।
फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें इस्लामाबाद पर टिकी हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि अरागची और डार के बीच हुई इस बातचीत के बाद क्या कोई आधिकारिक बयान जारी होता है या नहीं। अगर अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि सच में इस्लामाबाद में मिलते हैं, तो यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दशा और दिशा दोनों बदल सकता है। कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पाकिस्तान अमेरिका और ईरान को एक मेज पर ले आता है, तो यह इस्लामाबाद के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत होगी। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की छवि एक 'पीसमेकर' के रूप में मजबूत हो सकती है।
डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन की ईरान को लेकर हमेशा से सख्त नीति रही है। ऐसे में यह देखना होगा कि क्या अमेरिकी प्रतिनिधि नरम रुख अपनाते हैं। वहीं, ईरान भी प्रतिबंधों से राहत पाने के लिए बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहता है। संयुक्त राष्ट्र और यूरोपीय देश इस संभावित बातचीत का स्वागत कर रहे हैं, क्योंकि मध्य पूर्व में युद्ध जैसी स्थिति किसी भी देश के हित में नहीं है।
पाकिस्तान इस वक्त भारी आर्थिक संकट से गुजर रहा है। अमेरिका के साथ संबंध सुधारने से उसे आईएमएफ और विश्व बैंक से राहत मिल सकती है, जबकि ईरान के साथ बेहतर संबंधों से उसे सस्ती ऊर्जा और गैस मिल सकती है। यह मध्यस्थता उसकी दोनों जरूरतें पूरी कर सकती है। भारत इस पूरी प्रक्रिया पर पैनी नजर रखेगा। पाकिस्तान का अमेरिका और ईरान के बीच अहम मध्यस्थ बनना, दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में पाकिस्तान के घटते महत्व को दोबारा बढ़ा सकता है, जिसका असर भारत-अमेरिका और भारत-ईरान संबंधों के समीकरण पर भी पड़ सकता है।
क्या इस्लामाबाद में होने वाली इस वार्ता के पीछे परदे के पीछे से चीन का भी कोई समर्थन है? क्योंकि चीन हाल ही में मध्य पूर्व (जैसे सऊदी-ईरान समझौता) में सक्रिय भूमिका निभा चुका है और पाकिस्तान चीन का सबसे करीबी सहयोगी है।