Iran-US ceasefire: ईरान और अमेरिका के बीच सीजफायर के बीच होर्मुज स्ट्रेट पर तेहरान द्वारा प्रस्तावित टोल और अंतरराष्ट्रीय कानून के असर को जानें। जानिए वैश्विक तेल आपूर्ति और ऊर्जा संकट पर संभावित प्रभाव।
Iran on Hormuz Strait: ईरान और अमेरिका के बीच दो सप्ताह के लिए भले ही अस्थायी युद्ध विराम की घोषणा हो गई हो, लेकिन तनाव अभी खत्म नहीं हुआ है। दरअसल, इसकी वजह तेहरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलने की कोशिश है। दोनों देशों के बीच सीजफायर में यह एक ऐसा प्रस्ताव है, जो वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर सकता है और ऊर्जा संकट को नई अनिश्चितता की ओर धकेल सकता है।
बता दें कि अमेरिका-ईरान के बीच सीजफायर में यह स्पष्ट है कि होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान का नियंत्रण बरकरार रहेगा। कई विशेषज्ञों ने इसको लेकर चिंता जताई है कि क्या अमेरिका ने वास्तव में ईरान के नियंत्रण को मान लिया है?
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों में से एक है। यह भौगोलिक और आर्थिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। यह मात्र 34 किमी चौड़ा है, फिर भी दुनिया की तेल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा यहां से गुजरता है। खास बात यह है कि यह जलमार्ग खाड़ी के तेल उत्पादक देशों को हिंद महासागर के जरिए वैश्विक बाजारों से जोड़ता है। इस मार्ग से केवल कच्चा तेल ही नहीं, बल्कि LNG और उर्वरक जैसी महत्वपूर्ण वस्तुएं भी गुजरती हैं।
अमेरिका-इजरायल के तनाव के बाद, ईरान होर्मुज स्ट्रेट पर अपने नियंत्रण को औपचारिक रूप देने का प्रयास कर रहा है। लंबे शांति समझौते से जुड़े प्रस्तावों के तहत, ईरान ओमान के साथ मिलकर स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलना चाहता है। रिपोर्टों के अनुसार, यह शुल्क जहाज के आकार और परिस्थितियों के अनुसार भिन्न हो सकता है।
कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि ईरान एक योजना पर काम कर रहा है, जिसके तहत जहाजों को होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने की अनुमति के लिए परमिट या लाइसेंस प्राप्त करना होगा। इस प्रक्रिया में ओमान भी शामिल हो सकता है। ईरान की संसद भी इस व्यवस्था को कानूनी रूप देने के लिए एक विधेयक का मसौदा तैयार कर रही है।
इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि ईरान का कदम केवल बयानबाजी नहीं है, बल्कि होर्मुज स्ट्रेट को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाने और उससे राजस्व प्राप्त करने का सुनियोजित प्रयास है।
मध्य-पूर्व संघर्ष शुरू होने के बाद ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) ने कुछ देशों को छूट देकर जहाजों की आवाजाही को सीमित किया। इस दौरान जहाजों पर हमले और फायरिंग की घटनाएं भी हुईं। परिणामस्वरूप यातायात में भारी गिरावट आई और भारत समेत कई देशों को ऊर्जा संकट का सामना करना पड़ा।
अंतरराष्ट्रीय समुद्र कानून के तहत, अंतरराष्ट्रीय नौवहन के लिए स्ट्रेट से गुजरने की स्वतंत्रता और निर्बाध आवागमन होना चाहिए। ऐसे स्ट्रेट से सटे देश जहाजों से गुजरने के लिए शुल्क नहीं ले सकते। तटीय देश केवल विशिष्ट सेवाओं, जैसे पायलटिंग या टग सहायता, के लिए बिना भेदभाव शुल्क वसूल सकते हैं। ऐसे में होर्मुज स्ट्रेट से ईरान द्वारा प्रस्तावित ट्रांजिट टोल अंतरराष्ट्रीय कानूनों के विपरीत होगा।
ईरान की ओर से ट्रांजिट टोल लगाने का प्रयास आर्थिक और भू-राजनीतिक प्रतीत होता है। तेहरान इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर भौगोलिक रणनीति का लाभ उठाकर ऊर्जा आपूर्ति पर निर्भर देशों पर प्रभाव डालना चाहता है। साथ ही, पश्चिमी प्रतिबंधों के जवाब में होर्मुज स्ट्रेट को आर्थिक दबाव के उपकरण के रूप में इस्तेमाल करना चाहता है।
ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट पर ट्रांजिट टोल लगाए जाने से वैश्विक बाजारों पर असर पड़ सकता है। शिपिंग पर अतिरिक्त लागत से केवल कच्चे तेल और गैस की कीमतें नहीं बढ़ेंगी, बल्कि बीमा प्रीमियम में भी वृद्धि होगी। इससे आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है।