Framework: ईरान ने स्पष्ट किया है कि जब तक दोनों देशों के बीच बातचीत का एक साझा ढांचा (फ्रेमवर्क) तय नहीं होता, तब तक अमेरिका के साथ वार्ता की कोई तारीख तय नहीं होगी। ईरान अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपने अधिकारों से कोई समझौता नहीं करेगा।
Iran-US Talks : ईरान और अमेरिका के बीच दशकों से चल रही कूटनीतिक तनातनी में एक नया मोड़ आ गया है। पूरी दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हुई हैं कि क्या दोनों देश एक बार फिर से बातचीत की मेज पर आएंगे। लेकिन ईरान ने अब दुनिया और अमेरिका के सामने अपनी स्थिति बिल्कुल साफ कर दी है। ईरान का स्पष्ट कहना है कि जब तक अमेंरिका के साथ बातचीत का कोई ठोस आधार या ‘फ्रेमवर्क’ तय नहीं हो जाता, तब तक किसी भी बैठक या वार्ता की तारीख निर्धारित नहीं की जाएगी। ईरान के इस कड़े रुख ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। अमेरिका के साथ वार्ता के संभावित नए दौर के बारे में पूछे गए एक सवाल का जवाब देते हुए ईरान के उप विदेश मंत्री सईद खतीबजादेह ने अपनी सरकार का पक्ष मजबूती से रखा। उन्होंने कहा कि हवा में तीर चलाने से कोई कूटनीतिक हल नहीं निकलता। जब तक दोनों पक्ष एक साझा ढांचे और एजेंडे पर सहमत नहीं हो जाते, तब तक वार्ता शुरू करने का कोई मतलब नहीं है।
उप विदेश मंत्री खतीबजादेह ने संवाददाताओं से बातचीत में कहा, “जब तक हम ढांचे पर सहमत नहीं हो जाते, तब तक हम तारीख तय नहीं कर सकते।” यह बयान दर्शाता है कि ईरान अब अमेरिका के साथ किसी भी जल्दबाजी वाले समझौते के मूड में नहीं है। ईरान चाहता है कि बातचीत से पहले यह तय हो कि किन मुद्दों पर चर्चा होगी और उसका परिणाम क्या हो सकता है। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि वार्ता में ईरान जो भी समझौता करे, उससे अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत उसके अधिकारों की पूरी तरह से रक्षा होनी चाहिए। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी दबाव में आकर अपने संप्रभु अधिकारों के साथ कोई समझौता नहीं करेगा।
ईरान ने अमेरिका को यह भी संदेश दिया है कि कूटनीति समानता के आधार पर होती है। खतीबजादेह ने साफ शब्दों में कहा, “ईरान अंतरराष्ट्रीय कानून से किसी भी प्रकार की छूट स्वीकार नहीं करेगा।” इसका सीधा सा अर्थ यह है कि ईरान नहीं चाहता कि उसके मामलों में कोई ऐसा नियम थोपा जाए जो बाकी दुनिया पर लागू नहीं होता। उन्होंने यह भी जोड़ा कि ईरान किसी भी कीमत पर “अपने अधिकारों का त्याग नहीं करेगा”।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान का यह बयान अमेरिका पर दबाव बनाने की एक कूटनीतिक रणनीति है। पिछले कुछ सालों में दोनों देशों के बीच परमाणु समझौते को लेकर कई दौर की वार्ताएं विफल हो चुकी हैं। ईरान अब यह सुनिश्चित करना चाहता है कि अगर वह दोबारा बातचीत शुरू करता है, तो उसके आर्थिक प्रतिबंधों को हटाने की गारंटी पहले ही ‘फ्रेमवर्क’ का हिस्सा हो। इस बयान से यह भी स्पष्ट होता है कि मध्य पूर्व में शांति बहाली का रास्ता अभी भी काफी लंबा और जटिल है। दोनों देशों को एक मेज पर लाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थों को कड़ी मेहनत करनी होगी।
कूटनीतिक विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि ईरान का यह रुख उसकी मजबूत होती विदेश नीति को दर्शाता है। यह अमेरिका के लिए एक चुनौती है कि वह ईरान को बिना ठोस प्रस्ताव के बातचीत के लिए राजी नहीं कर सकता। अब पूरी दुनिया की नजरें व्हाइट हाउस और अमेरिका के विदेश विभाग पर टिकी हुई हैं कि वे ईरान की इस ‘फ्रेमवर्क’ वाली शर्त पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देते हैं। क्या अमेरिका पहले एजेंडा तय करने के लिए तैयार होगा? ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत में हो रही इस देरी का अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति पर सीधा असर पड़ सकता है।