Trump Iran Policy: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव जारी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का मानना है कि उन्हें ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए अमेरिकी संसद की मंजूरी की कोई जरूरत नहीं है।
Trump: ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे तनाव के बीच एक बड़ी खबर सामने आ रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का मानना है कि ईरान के खिलाफ चल रहे मौजूदा सैन्य विवाद या युद्ध को जारी रखने के लिए उन्हें अमेरिकी संसद से किसी भी प्रकार की आधिकारिक मंजूरी लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। व्हाइट हाउस की इस नई रणनीति ने अमेरिकी राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
दरअसल, यह पूरा मामला 1973 के 'वॉर पॉवर्स रेजोल्युशन' कानून से जुड़ा हुआ है। इस ऐतिहासिक अमेरिकी कानून के अनुसार, देश के राष्ट्रपति को किसी भी विदेशी धरती पर युद्ध या सैन्य कार्रवाई शुरू करने के 60 दिनों के भीतर कांग्रेस (संसद) से युद्ध की आधिकारिक घोषणा या मंजूरी प्राप्त करना अनिवार्य होता है। यह कानून राष्ट्रपति की असीमित सैन्य शक्तियों पर लगाम लगाने के लिए बनाया गया था, ताकि बिना लोकतांत्रिक सहमति के देश को लंबे युद्धों में न धकेला जा सके।
अब व्हाइट हाउस के भीतर इस कानून को लेकर एक बिल्कुल अलग ही सोच पनप रही है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने जो तर्क दिया है, वह हैरान करने वाला है। उनके अनुसार, चूंकि 7 अप्रैल के बाद से अमेरिका और ईरान के बीच कोई सीधा सैन्य टकराव या गोलीबारी नहीं हुई है, इसलिए कानून में बताई गई '60-दिनों की समय सीमा' या तो रीसेट हो गई है या पूरी तरह से रुक गई है।
प्रशासन का सीधा सा तर्क यह है कि अगर अमेरिका अब ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का कोई नया दौर शुरू करता है, तो यह 60 दिनों की उल्टी गिनती जीरो से फिर से शुरू हो जाएगी। यानि, ट्रंप प्रशासन हर नए हमले के साथ अपने लिए बिना संसदीय मंजूरी के 60 दिन का नया समय निकाल सकता है। यह एक ऐसा तकनीकी पेच है, जिसका इस्तेमाल कर व्हाइट हाउस सीधे तौर पर कांग्रेस को किनारे कर रहा है।
दूसरी तरफ, अमेरिकी संसद यानी सीनेट में भी इस मुद्दे पर भारी घमासान देखने को मिला है। हाल ही में सीनेट ने ईरान पर 'वॉर पॉवर्स रेजोल्यूशन' को आगे बढ़ाने के खिलाफ मतदान किया। चूंकि सीनेट में रिपब्लिकन पार्टी (ट्रंप की अपनी पार्टी) का बहुमत है, इसलिए उन्होंने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। रिपब्लिकन सांसदों ने स्पष्ट कर दिया कि ऐसा कोई भी प्रस्ताव पास नहीं होने दिया जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम का नतीजा यह है कि हालात वहीं पहुंच गए हैं जहां वे कुछ दिन पहले थे। डोनाल्ड ट्रंप पूरी तरह से आश्वस्त हैं कि ईरान के खिलाफ कोई भी कदम उठाने के लिए उन्हें कांग्रेस की ताकत की कोई जरूरत नहीं है। अगर वह चाहें, तो अपने विशेषाधिकारों और इस 'तकनीकी लूपहोल' का इस्तेमाल करते हुए सैन्य कार्रवाई को अंजाम दे सकते हैं।
विपक्षी डेमोक्रेट्स और मानवाधिकार समर्थकों की तरफ से तीखी प्रतिक्रिया सामने आ रही है। उनका मानना है कि यह संविधान का सीधा उल्लंघन है और राष्ट्रपति को असीमित युद्ध शक्तियां देना खतरनाक साबित हो सकता है। अब आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या व्हाइट हाउस सच में ईरान पर कोई नया सैन्य अभियान शुरू करता है? इसके अलावा, इस कानूनी पेच के खिलाफ डेमोक्रेट्स सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं या नहीं, इस पर भी नजर रहेगी।
इस खबर का सीधा असर ग्लोबल मार्केट पर पड़ सकता है। मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने की आशंका से कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिल सकता है, जिसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।