
चीन की कम्युनिस्ट पार्टी जापान पर लगातार दबाव बना रही है। जासूसी, समुद्री घुसपैठ और आर्थिक तंगी के जरिए चीन टोक्यो को कमजोर करने की कोशिश कर रहा है।
एक नई रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि जापान को अब अकेले नहीं लड़ना चाहिए। उसे अपने सहयोगी देशों अमेरिका और यूरोप के साथ मिलकर मजबूत कदम उठाने होंगे।
रिपोर्ट लिखने वाले दलाई लामा के भतीजे खेदरूब थोंडुप ने कहा कि चीन जापान की ताकत और उसके अमेरिका के साथ गठबंधन की परीक्षा ले रहा है। अगर जापान टूटा तो पूरा नियम-आधारित विश्व व्यवस्था खतरे में पड़ जाएगी। इसलिए टालमटोल का समय खत्म हो गया है।
चीन की खुफिया एजेंसियां जापान की सेमिकंडक्टर और रोबोटिक्स जैसी उन्नत कंपनियों पर निशाना साध रही हैं। साइबर हमले और अंदरूनी लोगों को खरीदकर टेक्नोलॉजी चुराने की कोशिश हो रही है।
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि जापान को अपनी खुफिया सुरक्षा मजबूत करनी चाहिए। यूनिवर्सिटी और रिसर्च एक्सचेंज प्रोग्राम पर कड़ी नजर रखनी चाहिए। साथ ही जापान-अमेरिका-यूरोप की एक संयुक्त टीम बनाकर टेक्नोलॉजी चोरी रोकनी चाहिए।
चीन के कोस्ट गार्ड और मछली पकड़ने वाले जहाज नियमित रूप से जापान के सेनकाकू द्वीपों के आसपास पानी में घुस रहे हैं। यह सिर्फ चिढ़ाने भर नहीं है, बल्कि जापान की संप्रभुता को चुनौती देने की रणनीति है।
रिपोर्ट में सलाह दिया गया है कि जापान को अपने गश्ती जहाज बढ़ाने चाहिए, समुद्री निगरानी मजबूत करनी चाहिए और सहयोगी देशों के साथ संयुक्त अभ्यास करना चाहिए। ताकि दुनिया को साफ संदेश जाए कि उसका पानी कोई नहीं छू सकता।
रिपोर्ट में जोर दिया गया है कि चीन की सारी रणनीतियां एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। इसलिए जवाब भी उसी तरह समन्वित होना चाहिए। जापान अकेला नहीं लड़ सकता। उसके दोस्त देशों को समझना होगा कि जापान की सुरक्षा का मतलब पूरे क्षेत्र की स्थिरता है। कूटनीति, अर्थव्यवस्था और सैन्य स्तर पर मिलकर काम करना होगा।
इस साल नवंबर में जापानी प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने संसद में कहा था कि अगर चीन ताइवान पर हमला करता है तो जापान की सेल्फ डिफेंस फोर्स भी प्रतिक्रिया दे सकती है। चीन इस बात से बहुत नाराज है। वह ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और जरूरत पड़ी तो ताकत से जोड़ने की बात करता है।
मई महीने में जापान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने चीन और रूस की जापान की "रीमिलिटराइजेशन" वाली आलोचना को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि चीन की सैन्य गतिविधियां पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय हैं।