
धरती पर आज भी ऐसे कई जीव मौजूद हैं, जिनके बारे में विज्ञान को कोई जानकारी नहीं है। ऐसे में वैज्ञानिक भी जीवों की अलग-अलग प्रजातियों की खोज में लगे रहते हैं। हाल ही में वैज्ञानिकों को ऐसी ही एक खोज में कामयाबी मिली है। कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (Democratic Republic Of Congo / DR Congo) में वैज्ञानिकों ने बंदर (Monkey) की एक नई प्रजाति की खोज की है। घने जंगलों में मिली बंदरों की इस नई प्रजाति को 'लिक्वेली' (Likweli) नाम दिया गया है।
कांगो में हुई यह खोज न सिर्फ वैज्ञानिकों के लिए बड़ी है, बल्कि जैव विविधता के संरक्षण के लिए भी अहम है। इस बंदर के होंठ नारंगी रंग के हैं। वहीँ इसका शरीर काला है। ये बंदर सीमित इलाके में रहना पसंद करते है और इंसानों के संपर्क में बहुत कम आते हैं। इसी वजह से अब तक इस प्रजाति की पहचान नहीं हो सकी थी। बीते 15 वर्षों में इस क्षेत्र में खोजी गई यह सिर्फ दूसरी नई बंदर प्रजाति है और पिछले 75 वर्षों में अफ्रीका में ढूंढी गई बंदरों की सिर्फ पांचवीं प्रजाति है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज अफ्रीकी प्राइमेट्स (बंदरों की प्रजातियों) के विकासक्रम को समझने में अहम साबित हो सकती है।
'लिक्वेली' प्रजाति के बंदर कोलोबस समूह के सदस्य हैं। इस समूह के बंदर मुख्य रूप से पत्तियाँ खाते हैं और पश्चिमी-मध्य अफ्रीका में पाए जाते हैं। इस नई प्रजाति का वैज्ञानिक नाम कोलोबस कोंगोएन्सिस है, जो कांगो के सम्मान में रखा गया है। इस प्रजाति के बंदरों का वजन लगभग 7 किलोग्राम होता है और नाक से पूंछ तक इसकी लंबाई करीब 4 फीट होती है। स्थानीय शिकारी इसे 'कसाबा नकोनी' यानी पेड़ों की शाखाएं हिलाने वाला कहते है।
वैगेनिकों ने इन बंदरों की आनुवंशिक जांच की। इस जांच से पता चला है कि यह प्रजाति अपने सबसे करीबी ज्ञात रिश्तेदार बंदरों से लगभग 50 लाख साल पहले अलग हो गई थी। इसलिए वैज्ञानिक इसे अफ्रीकी बंदरों के विकासक्रम की एक बेहद प्राचीन शाखा मान रहे हैं। इस बंदर की पहली तस्वीर वर्ष 2008 में लोमामी नदी के किनारे ली गई थी, लेकिन उस समय वैज्ञानिक इस प्रजाति का पता नहीं लगा पाए थे। ऐसे में अब इस प्रजाति की खोज को काफी अहम माना जा रहा है।