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जिन्ना जहां रुके थे, वहां अब बर्गर शॉप, मंदिर तक को सरकार ने नहीं छोड़ा, आजादी के बाद कितना बदल गया पाकिस्तान?

फैसलाबाद के वरिष्ठ पत्रकार मियां अजाज बशीर ने बताया कि 1946 में कायद-ए-आजम मुहम्मद अली जिन्ना एक मकान में ठहरे थे, जो आजादी की लड़ाई का हिस्सा था।

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Apr 07, 2026
मोहम्मद अली जिन्नाह। (फोटो- Wikipedia)

पाकिस्तान के फैसलाबाद में दर्जनों ऐसी इमारतें थीं जो सिर्फ पत्थर और ईंट नहीं थीं। वो उस दौर की गवाह थीं जब यह भारत-पाकिस्तान एक था। जब हिंदू, मुसलमान, सिख एक ही बाजार में चलते थे। लेकिन अब उन इमारतों की जगह प्लाजा हैं, पार्किंग लॉट हैं, फास्ट फूड की दुकानें हैं।

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वो मंदिर जो 1906 में बना था

झंग बाजार में लासूरी शाह दरगाह के पास एक आर्य समाज मंदिर था। 1906 में सनातन धर्म समुदाय ने इसे बनवाया था। बंटवारे से पहले यह हिंदू श्रद्धालुओं का बड़ा केंद्र था।

बंटवारे के बाद यह मंदिर औकाफ विभाग के अधीन आ गया। लेकिन वहां से आगे की कहानी बेहद दुखद है। कुछ निजी लोगों ने इसे तोड़ दिया और उस जमीन पर एक कमर्शियल बिल्डिंग खड़ी कर दी। जिस जगह कभी घंटियां बजती थीं, अब वहां दुकानदारी होती है।

जिन्ना जहां ठहरे थे, वहां अब बर्गर मिलता है

फैसलाबाद के वरिष्ठ पत्रकार और आर्ट गैलरी के चेयरमैन मियां अजाज बशीर ने एक और दर्दनाक बात बताई। 1946 में कायद-ए-आजम मुहम्मद अली जिन्ना एक मकान में ठहरे थे।

वो मकान आजादी की लड़ाई का हिस्सा था। एक ऐतिहासिक स्मारक बन सकता था। लेकिन वो मकान अब नहीं है। उस जगह अब एक फास्ट फूड रेस्टोरेंट और एक प्राइवेट बैंक का दफ्तर है। सोचिए, जिस जमीन पर खड़े होकर जिन्ना ने शायद पाकिस्तान के सपने देखे होंगे, वहां आज लोग बर्गर खाते हैं।

लाइब्रेरी गई, बैंक गया, रेस्ट हाउस गया

यह सिर्फ मंदिर और जिन्ना के बंगले की बात नहीं है। मोंटगोमरी बाजार में सनातन धर्म लाइब्रेरी थी। बंटवारे के बाद इसे मुस्लिम लीग हाउस बना दिया गया। लेकिन आगे चलकर यह भी तोड़ी गई और उसकी जगह प्लाजा खड़ा हो गया।

कारखाना बाजार के पास अंग्रेजों के जमाने का एक रेस्ट हाउस था जो किसानों और मुसाफिरों के लिए बना था। वो भी जमींदोज हो गया।

जमीन दुकानों में बदल गई जो तेल डिपो चलाने वालों को दे दी गई। अजाज बशीर का कहना है कि इससे उस इलाके में आग का खतरा भी बढ़ गया है।

कचहरी बाजार में 1921 में बना सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक का भवन था। बशीर के मुताबिक जाली कागजात बनाकर उस पर कब्जा किया गया और फिर उसे तोड़कर नई बिल्डिंग बना दी गई। पास में ही एक पुरानी म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन की इमारत थी। वो भी गई। अब वहां पार्किंग है।

कानून है, लेकिन लागू कौन करे?

पंजाब में 1982 में एक कानून बना था, Punjab Special Premises Preservation Act। इसका मकसद ही यही था कि ऐतिहासिक इमारतों को बचाया जाए।

लेकिन अजाज बशीर पूछते हैं कि यह कानून कहां है? किसी ने इसे लागू क्यों नहीं किया? उन्होंने अधिकारियों से मांग की है कि विभाजन के बाद की संपत्तियों के पुराने रिकॉर्ड खंगाले जाएं और जिन लोगों ने गैरकानूनी तरीके से इन जमीनों पर कब्जा किया है उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो।

दावे की पोल खुल रही पोल

पाकिस्तान अक्सर अपनी विरासत और इतिहास की बात करता है। लेकिन फैसलाबाद में जो हो रहा है वो उस दावे की पोल खोलता है।

जो इमारतें आजादी की लड़ाई की गवाह थीं, जो मंदिर सदियों पुरानी साझा संस्कृति की निशानी थे, जो इमारतें उस वक्त की याद दिलाती थीं जब यह पूरा इलाका एक था, वो सब मिटाई जा रही हैं।

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