Injustice:पाकिस्तान की जेल में बंद इमरान ख़ान अंधेपन के कगार पर, जबकि नवाज़ शरीफ़ और ज़रदारी को मिले थे वीआईपी मज़े। जानिए पाकिस्तान के दोहरे क़ानून की पूरी हक़ीक़त।
Political Vendetta : पाकिस्तान की सियासत में बदला लेना कोई नई बात नहीं है, लेकिन जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्रियों के साथ सुलूक करने में भेदभाव का 'काला सच' अब पूरी दुनिया के सामने आ गया है। मीडिया रिपोटर्स के अनुसार एक तरफ़ जहां पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ (Nawaz Sharif medical bail) और पूर्व राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी (Asif Zardari VIP treatment) को जेल में रहते हुए न केवल वीआईपी सुविधाएं मिलीं, बल्कि विदेश में इलाज करवाने की छूट भी मिली, वहीं दूसरी तरफ़ क्रिकेट के मैदान से राजनीति के शिखर तक पहुंचे पूर्व प्रधानमंत्री इमरान ख़ान (Imran Khan) अदियाला जेल में बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। उनकी एक आंख की रोशनी 85% तक जाने की ख़बर (Imran Khan vision loss) ने इस भेदभाव को और गहरा कर दिया है।
पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ (PML-N) के सुप्रीमो नवाज़ शरीफ़ जब भ्रष्टाचार के मामलों में जेल में बंद थे, तो उनकी बीमारी (प्लेटलेट्स कम होना) को आधार बनाकर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। यही नहीं, उन्हें जेल में घर का खाना, एयर कंडीशनर और निजी सहायकों की सुविधा भी मिली। ध्यान रहे कि 2019 में इमरान ख़ान की ही सरकार के दौरान, अदालतों और मेडिकल बोर्ड की सिफ़ारिश पर उन्हें इलाज करवाने के लिए लंदन जाने की अनुमति दी गई। 'इलाज' के नाम पर गए नवाज़ शरीफ़ 4 साल तक लंदन में रहे और वहां से अपनी पार्टी चलाते रहे।
पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) के सह-अध्यक्ष आसिफ़ अली ज़रदारी को भी जेल में रहते हुए कई बार विशेष रियायतें मिलीं। जब वे बीमार पड़े, तो उन्हें पाकिस्तान इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज (PIMS) में भर्ती कराया गया, जिसे 'सब-जेल' घोषित कर दिया गया था। वहां उन्हें वीआईपी सुइट और निजी डॉक्टरों की टीम मिली। इसके अलावा उन्हें इलाज के लिए कई बार एक शहर से दूसरे शहर एयर लिफ़्ट भी किया गया।
इसके ठीक उलट, इमरान ख़ान पिछले एक साल से अदियाला जेल में बंद हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक़, अक्टूबर से वे आंखों में धुंधलेपन की शिकायत कर रहे थे, लेकिन उन्हें 3 महीने तक सिर्फ़ 'आई ड्रॉप्स' दी गईं। वहीं उनके निजी चिकित्सक से जांच कराने की मांग को बार-बार ख़ारिज किया गया। इसके अलावा ख़ून के थक्के जमने (Blood Clot) की आशंका के बावजूद उनके रेगुलर ब्लड टेस्ट तक नहीं कराए गए। नतीजा यह हुआ कि उनकी दाईं आंख की रोशनी लगभग ख़त्म होने वाली है।
पाकिस्तानी क़ानून और मानवाधिकारों के मुताबिक़, हर क़ैदी को उचित इलाज का हक़ है। क़ानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि नवाज़ और ज़रदारी के समय जो 'मानवीय आधार' (Humanitarian Grounds) लागू थे, वे इमरान ख़ान के मामले में ग़ायब क्यों हैं? यह साफ़ तौर पर राजनीतिक प्रतिशोध (Political Vendetta) का मामला नज़र आता है। सुप्रीम कोर्ट का हालिया हस्तक्षेप यह साबित करता है कि कार्यपालिका (सरकार) अपनी ज़िम्मेदारी निभाने में विफ़ल रही है।
बहरहाल, इमरान ख़ान का मामला सिर्फ़ एक क़ैदी की सेहत का नहीं, बल्कि पाकिस्तान की सड़ी-गली व्यवस्था का है, जहां 'क़ानून का शासन' व्यक्ति विशेष के हिसाब से बदल जाता है। यक्ष प्रश्न यह है कि क्या पाकिस्तान अपने ही पूर्व प्रधानमंत्री को अंधा होने के लिए छोड़ देगा, या सुप्रीम कोर्ट के डंडे के बाद उन्हें वो सुविधाएं मिलेंगी जो उनके विरोधियों को मिलती रही हैं? ( इनपुट: IANS)