Energy Supply:रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भारत को अबाधित ऊर्जा आपूर्ति का पक्का आश्वासन दिया है। साथ ही उन्होंने अमेरिका पर वैश्विक ऊर्जा मार्गों पर कब्जा करने और यूरोप को संकट में धकेलने का गंभीर आरोप लगाया है।
Sergey Lavrov : ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक से ठीक पहले, रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भारत को ऊर्जा सुरक्षा का पक्का भरोसा दिया है। लावरोव ने एक विशेष इंटरव्यू में स्पष्ट किया कि 'अनुचित पश्चिमी प्रतिस्पर्धा' का भारत-रूस ऊर्जा व्यापार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इसके साथ ही उन्होंने अमेरिका पर कड़ा प्रहार करते हुए आरोप लगाया कि वाशिंगटन दुनिया भर के प्रमुख ऊर्जा मार्गों पर अपना कब्जा जमाना चाहता है।
लावरोव के मुताबिक, अमेरिका की मंशा न सिर्फ वैश्विक ऊर्जा गलियारों पर एकाधिकार स्थापित करने की है, बल्कि वह उन देशों पर भी भारी दबाव बना रहा है जो रूस के साथ ऊर्जा व्यापार कर रहे हैं। उन्होंने जोर देकर कहा, 'अमेरिका की नीयत साफ है-वे सब कुछ हथियाना चाहते हैं और सभी महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों पर नियंत्रण चाहते हैं। मुझे पूरा यकीन है कि भारत इस भू-राजनीतिक खेल को अच्छी तरह समझता है।' उन्होंने आश्वासन दिया कि रूस हर हाल में यह सुनिश्चित करेगा कि पश्चिमी देशों के इस 'अनुचित खेल' का असर भारत के हितों और दोनों देशों के बीच हुए करारों पर बिल्कुल न पड़े।
पश्चिमी और विशेषकर यूरोपीय देशों पर निशाना साधते हुए लावरोव ने कहा कि रूसी ऊर्जा से दूरी बनाना बाजार की कोई मजबूरी या प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित कदम है। वे सिर्फ रूस को दंडित करने की मंशा से तेल और गैस पर प्रतिबंध लगा रहे हैं। लावरोव ने अपनी बात रखते हुए कहा कि रूस चाहे मित्र देश हो या शत्रु, हमेशा अपने वादों और समझौतों का सम्मान करता है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि पश्चिम की परंपरा दूसरों के खर्चे पर जीने, इतिहास को मिटाने और अपने मनमाने नियम थोपने की रही है।
यूरोप के वर्तमान ऊर्जा संकट का ठीकरा भी लावरोव ने पश्चिमी नीतियों पर फोड़ा। उन्होंने दावा किया कि रूसी तेल-गैस पर प्रतिबंध लगाकर यूरोप ने खुद को गहरे आर्थिक संकट में धकेल दिया है और अब उसे मजबूरी में अमेरिका से अत्यधिक महंगी लिक्विफाइड नेचुरल गैस खरीदनी पड़ रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य में उत्पन्न स्थिति का जिक्र करते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि ऊर्जा और खाद्य संकट की सबसे बड़ी मार अंततः यूरोप को ही झेलनी पड़ेगी। दूसरी ओर, भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि ऊर्जा खरीद के मामले में उसकी प्राथमिकता हमेशा अपने राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और अपने नागरिकों के लिए सस्ती आपूर्ति सुनिश्चित करना है। ( इनपुट : ANI)