
US Senate Rejects Trump Iran War Powers Resolution: अमेरिका और ईरान के बीच जारी भीषण संघर्ष के बीच वाशिंगटन की सत्ता के गलियारों में राजनीतिक ड्रामा अपने चरम पर पहुंच गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़ने की असीमित शक्तियों को सीमित करने वाला ऐतिहासिक 'वॉर पावर्स रिज़ॉल्यूशन' अमेरिकी सीनेट में महज 49-50 के मामूली अंतर से खारिज हो गया।
यह लगातार दूसरी बार है जब दो हफ़्तों के भीतर संसद ने राष्ट्रपति के सैन्य अभियानों पर रोक लगाने की कोशिश की है। हालांकि, वोटिंग के दौरान पार्टी लाइनों से हटकर हुए क्रॉस-वोटिंग ने अमेरिकी संसद में इस युद्ध को लेकर बढ़ती बेचैनी को उजागर कर दिया है:
डेमोक्रेट्स में सेंध: पेन्सिलवेनिया के सीनेटर जॉन फेटरमैन अपनी ही डेमोक्रेटिक पार्टी के रुख के खिलाफ जाकर रिपब्लिकन खेमे के साथ खड़े नजर आए।
रिपब्लिकन बगावत: तीन प्रमुख रिपब्लिकन सीनेटरों मेन की सुज़ैन कोलिन्स, अलास्का की लिसा मुर्कोवस्की और केंटकी के रैंड पॉल ने राष्ट्रपति के खिलाफ प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया।
दिग्गज नेता की गैरमौजूदगी: रिपब्लिकन नेता मिच मैकोनेल जून में हुई एक दुर्घटना से उबरने के कारण चिकित्सा अवकाश पर हैं और इस निर्णायक वोटिंग में हिस्सा नहीं ले सके।
28 फरवरी को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर संयुक्त सैन्य कार्रवाई शुरू की थी, तब इस अभियान के चार से पांच सप्ताह में खत्म होने का दावा किया गया था। इस हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत भी हुई। हालांकि, अब 5 महीने से अधिक का समय बीत चुका है और युद्ध का कोई अंत नजर नहीं आ रहा।
सैन्य कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य तेहरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना और उसके समर्थित गुटों पर लगाम लगाना था। लेकिन नए ईरानी नेतृत्व के तहत तेहरान अब और भी तेजी से परमाणु क्षमता हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ता दिख रहा है।
तनाव तब और बढ़ गया जब जून में हुआ संघर्षविराम कुछ ही हफ़्तों में ध्वस्त हो गया। ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल हमले किए और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तेल के टैंकरों की आवाजाही को ठप कर दिया, जिससे वैश्विक स्तर पर ऊर्जा का बड़ा संकट पैदा हो गया है।
अमेरिकी संविधान के तहत युद्ध की औपचारिक घोषणा करने का अधिकार केवल संसद (कांग्रेस) के पास है। वियतनाम युद्ध के दौरान 1973 में अमेरिकी संसद ने 'वॉर पावर्स एक्ट' (War Powers Resolution) पारित किया था।
इस कानून के मुताबिक, राष्ट्रपति यदि संसद की पूर्व अनुमति के बिना विदेश में अपनी सेना भेजते हैं, तो उन्हें 60 दिनों के भीतर संसद से मंजूरी लेनी होती है। मंजूरी न मिलने की स्थिति में सेना वापस बुलानी पड़ती है।
जून के अंत में सीनेट ने 50-48 के बहुमत से एक बार इस प्रस्ताव को पारित भी कर दिया था। लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा रिपब्लिकन सांसदों से सीधे व्यक्तिगत मुलाकात और राजनीतिक दबाव के बाद बिल पर दोबारा वोटिंग हुई और कुछ सांसदों ने अपने वोट बदल लिए।
हालिया हमले में अमेरिकी जेट विमानों ने ईरान के दर्जनों ठिकानों पर भारी बमबारी की है, जिसके जवाब में मध्य पूर्व का माहौल बारूद के ढेर पर बैठा नजर आ रहा है। अमेरिकी संसद में बजट और पारदर्शिता को लेकर उठते सवाल और दिन-ब-दिन बढ़ता वित्तीय बोझ यह साबित कर रहा है कि व्हाइट हाउस के लिए इस युद्ध का राजनीतिक और आर्थिक मूल्य चुकाना अब आसान नहीं रह गया है।