
Rare tree species: इंसानी गतिविधियों, जंगलों की कटाई और जलवायु परिवर्तन ने पृथ्वी से कई अनोखी प्रजातियों का अस्तित्व मिटा दिया है। लेकिन विज्ञान और इंसानी जज्बे के मेल ने अब दुनिया के सबसे दुर्लभ पेड़ को विलुप्त होने के कगार से वापस खींच लिया है। चिली के सुदूर रॉबिन्सन क्रूसो द्वीप पर बचे इस प्रजाति के आखिरी जंगली पेड़ से जुटाए गए बीज अब इंग्लैंड में सफलतापूर्वक अंकुरित हो गए हैं। गंभीर रूप से लुप्तप्राय हो चुके इस प्रजाति का वैज्ञानिक नाम डेन्ड्रोसेरिस नेरीफोलिया है।
एक समय यह पेड़ ज्वालामुखी से बने 'रॉबिन्सन क्रूसो द्वीप' पर चारों तरफ फैले हुए थे। लेकिन जंगलों की कटाई, इंसानी बस्तियों के बसने, मिट्टी के कटाव, चरने वाले मवेशियों, जंगलों की आग के कारण यह प्रजाति खत्म होती चली गई। आज पूरी दुनिया में इस प्रजाति का एक ही पेड़ जीवित बचा है। इसी पेड़ से जुटाए गए 29 बीजों को ब्रिटेन के मिलेनियम सीड बैंक भेजा गया। एक्स-रे जांच में 25 बीज जीवित पाए गए और अब इनसे रॉयल बोटनिक गार्डन में सात पौधे उग आए हैं।
इस आखिरी बचे पेड़ के बीजों को सुरक्षित रखने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय मिशन चलाया गया। यह पेड़ एक सीधी खड़ी और खतरनाक चट्टान के किनारे टिका हुआ है। यहां पहुंचने के लिए बीज संग्रहकर्ताओं और रेंजर्स को घंटों पैदल चलना पड़ा और रस्सियों के सहारे खतरनाक चढ़ाई करनी पड़ी।
वहीं, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान-गांधीनगर (आईआईटी-गांधीनगर) के शोधकर्ताओं ने आम भारतीय औषधीय पौधों से रासायनिक रहित बहुउद्देशीय कार्बन नैनोकण (सीएनपी)) तैयार करने में सफलता हासिल की है। यह शोध नैनो एक्सप्रेस में प्रकाशित हुआ है। टीम ने जामुन, तुलसी, नीम, अमरूद और करी पत्ते के पौधों का चयन उनकी एंटीऑक्सीडेंट व एंटी-कैंसर विशेषताओं के आधार पर किया। शोध के अनुसार भारी धातु जैसे आयरन, लेड और निकल मानव स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा हैं। अक्सर इनकी पहचान के लिए महंगे और जटिल उपकरणों की आवश्यकता होती है।
टीम ने माइक्रोवेव आधारित त्वरित विधि से कार्बन नैनोकण बनाए, जो उच्च संवेदनशीलता और पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं। शोध में पांच प्रकार के सीएनपी पराबैंगनी प्रकाश में चमकीले लाल (फ्लोरेसेंस) दिखे। अमरूद से बने सीएनपी निकल आयन की पहचान कर सकते हैं, वहीं नीम व जामुन से बने सीएनपी क्रमशः फेरस व फेरिक आयन को पहचानते हैं।
तुलसी से बने सीएनपी फेरस व लेड आयन की पहचान में सक्षम रहे। भारी धातुओं की मात्रा बढ़ने पर फ्लोरेसेंस की तीव्रता और अधिक कम हो गई, जिससे इनके स्तर का अनुमान लगाना संभव हुआ। करी पत्ते से बने सीएनपी में यह गुण नहीं पाया गया, जिसका कारण धातुओं के प्रति उनकी गैर-चयनात्मकता बताया गया है।