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भालु की बढ रही जनसंख्या; जंगल छोड़ गांवों का रूख कर रहे भालु, भालुओं पर मंडरा रहा मौत का साया

भालु की बढ रही जनसंख्या; जंगल छोड़ गांवों का रूख कर रहे भालु, भालुओं पर मंडरा रहा मौत का साया

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Rising population The beel moving towards the villages leaving the for

भालु की बढ रही जनसंख्या; जंगल छोड़ गांवों का रूख कर रहे भालु, भालुओं पर मंडरा रहा मौत का साया

वन क्षेत्रों में शिकारियों की बढ़ती पैठ में हर माह एक-दो भालू हो रहे मौत का शिकार
अनूपपुर। जिले के अनूपपुर वनपरिक्षेत्र से लेकर बिजुरी व अमरकंटक वनपरिक्षेत्र में लगातार भालूओं की बढ़ती आबादी अब उनके मौत का कारण भी बनने लगी है। खाना व पानी की तलाश में गांवों की ओर बढ़े पग में ग्रामीणों से होने वाला सामना भी भालूओं के शिकार का एक कारण माना जा रहा है। यही कारण है कि पिछले साल-सवा साल में लगभग १८-२० भालूओं की मौत की घटना सामने आ चुकी है। इनमें कुछ बीमारी तथा कुछ शिकारियों के शिकार के रूप में शामिल है। जबकि हाल के दिनों में भालूओं और ग्रामीणों के आमना-सामना में आधा दर्जन लोग भी असामायिक मौत के शिकार के साथ डेढ़ दर्जन लोग घायल हुए हैं, इनमें जुलाई माह के दौरान वेंकटनगर के जंगल में छत्तीसगढ़ की सीमा से अनूपपुर की सीमा में आए तीन गडेरियों की अद्र्धरात्रि समय भालूओं के हमले में सामूहिक मौत एक उदाहरण है। वनविभाग का मानना है कि पूर्व की उपेक्षा भालूओं की जनसंख्या में लगातार हो रही वृद्धि तथा भालूओं के रहवास क्षेत्र में ग्रामीणों की दखल भी दोनों मौत के कारण है। इसके लिए ग्रामीणों को लगातार भालूओं से सुरक्षित रहने के साथ वन क्षेत्रों में अकेले या शाम के समय नहीं जाने की अपील की जाती है। लेकिन ग्रामीण भी इन सुझावों की ज्यादा परवाह नहीं करते। वनविभाग का मानना है कि हाल के वर्षो में बारिश की अल्पमत्र मात्रा के कारण पानी भी इन शाकाहारी जानवरों के लिए समस्या बन गया है। जिसके कारण भालू पानी व खाने की तलाश में गांवों की सीमाओं को लांघ प्रवेश कर रहे हैं। वनविभाग की जानकारी के अनुसार जिले के सात वनपरिक्षेत्रों में जैतहरी, कोतम और बिजुरी वनपरिक्षेत्र में भालूओं की संख्या बहुयात है। आंकड़ों में इनकी संख्या वर्तमान में लगभग ५५०-६०० के बीच बताई जाती है। लगभग ६०० भालूओं के अलग अलग क्षेत्रों में विचरण के कारण ग्रामीण भालूओं के हमले के शिकार बन रहे हैं। यह तीनों वनपरिक्षेत्र छत्तीसगढ़ की सीमा से सटे और विस्तारित हैं, जिसके कारण भालूओं के रहवास क्षेत्र अंतर्गत १२५-१५० गांव भी प्रभावित हैं। भालूओं के हमले के कारण ग्रामीण घरों से बाहर निकलने से कतरा रहे हैं। बावजूद वनविभाग भालूओं और ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए कोई विशेष ठोस प्रयास नहीं कर सका है। अधिकारियों का कहना है कि वनपरिक्षेत्र अधिक विस्तारित होने के कारण व्यापक सुरक्षा के इंतजाम नहीं किए जा सकते। लेकिन जामवंत योजना के तहत हादसों को कम कर सकते हैं। लेकिन यह जामवंत योजना अबतक शासन के पाले में अटकी है।
बॉक्स: औषधि निर्माण में भी बन रहे शिकार
आदिवासी परम्पराओं में भालू के अंग औषधि बनाने के उपयोग में लाया जाता है। अंग महंगे दामों में बिकती भी है। जिसके कारण शिकारियों द्वारा भालूओं का अधिक शिकार किया जाता है। अधिकांश भालूओं के मिले शव में उनके नाखून, लिंग, दांत सहित अन्य अंग गायब मिले है। वहीं भालूओं की बढ़ती आबादी तथा क्षेत्र वर्चस्वता में भालूओं का पलायन भी शिकारियों की नजर में असुरक्षित बना दिया है, जहां जंगलों के बीहड़ में शिकारियों की बढ़ती पैठ में वे आसानी से शिकार हो जाते हैं।
बॉक्स: समझाईश के अलावा नहीं स्थायी सुरक्षा
वनविभाग का कहना है कि भालू शाकाहारी होते हैं, जिसके कारण उनके मनपंसद खानों में मक्का, बेर, बेल, अमरूद सहित अन्य फल होते हैं। पूर्व में जिले में भालूओं की संख्या ३००-४०० के बीच थी, लेकिन पिछले कुछ सालों में भालूओं की संख्या में अधिक वृद्धि पाई गई। इतनी तादाद में भालूओं का अलग अलग क्षेत्र में विचरण तथा ग्रामीण परिवेश का भालू रहवासी सीमा में आने के कारण लगातार ग्रामीण और भालूओं का आमना सामना हो रहा है। इनकी सुरक्षा के लिए पूर्व में जामवंत योजना के प्रस्ताव तैयार किए गए थे। जिसमें भालूओं के वनीय सीमाओं को पार करने से रोकने फलदार पौधों जैसे अमरूद, कटहल, बेर, बेल सहित अन्य पौधों को लगाया जाना था। बेर, अमरूद, कटहल भालूओं को प्रिय भोजन माना जाता है, यहीं कारण है कि इनके सीजन में भालूओं का हमला अधिक बढ़ जाता है। लेकिन फिलहाल जामवंत योजना शासन के पाले में अटका पड़ा है।
वर्सन:
भालू की आयु सीमा १५-१८ वर्ष के बीच मानी जाती है। इनमें कुछ स्वाभाविक मौतें होती है और कुछ शिकार के। भालूओं की संख्या अधिक बढ़ गई है। जिसमें खाना और पानी की तलाश में ये ग्रामीण अंचलों की ओर चले आते हैं और शिकार का कारण बन जाते हैं। जामवंत योजना के लिए प्रयास किए जाएंगे।
एचएस भार्गव, वनमंडलाधिकारी अनूपपुर।