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MP news: केंद्र सरकार ने अधिवक्ता अधिनियम, 1961 में संशोधन के लिए जो प्रस्तावित ड्रॉफ्ट तैयार किया है, उसका अशोकनगर जिले में भी विरोध शुरु हो गया है। मुंगावली में शुक्रवार को इस प्रस्ताव को वकीलों के अधिकारों और स्वतंत्रता के खिलाफ बताते हुए शुक्रवार को अपने न्यायालयीन प्रकरणों में पैरवी नहीं की। प्रस्तावित अधिनियम के अनुसार यदि वकीलों ने हड़ताल की या अदालत के कामकाज का बहिष्कार किया तो उन पर 3 लाख रुपए तक का जुर्माना लगेगा। अधिवक्ताओं ने इस कानून को अधिवक्ता समुदाय के खिलाफ बताया है और इसे वापस न लेने पर पूरे देश में उग्र आंदोलन करने की चेतावनी दी है।
-धारा 35 ए के तहत वकीलों को हड़ताल और बहिष्कार करने से रोका गया है।
- धारा 35 के तहत वकीलों पर 3 लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
- अगर कोई व्यक्ति झूठी शिकायत करता है तो उस पर मात्र 50,000 रुपए का जुर्माना लगाया जाएगा।
- वकीलों के लिए कोई सुरक्षा प्रावधान नहीं रखा गया है, जिससे वे मनगढ़ंत शिकायतों का शिकार हो सकते हैं।
- धारा 36 के तहत बार काउंसिल ऑफ इंडिया को किसी भी वकील को तुरंत निलंबित करने का अधिकार दिया गया है।
अधिवक्ता अधिनियम 1961 में कानूनी पेशे की व्याख्या की गई है। इसमें वकीलों और बार काउंसिल के काम तय किए हैं। लेकिन अब अधिवक्ता अधिनियम में संशोधन के लिए बिल तैयार किया गया है। इस प्रस्तावित बिल से अधिवक्ताओं को बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ेगा। इससे अधिवक्ताओं के हितों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। अधिवक्ता संघ हमेशा न्यायालय एवं सरकार की नीतियों का समर्थन करता रहा है, किंतु उक्त प्रस्तावित संशोधन से अधिवक्ताओं के हितों पर विपरीत प्रभाव पडऩे की संभावना है, जो कि अधिवक्ताओं की स्वतंत्रता व अधिकारों को भी प्रभावित करेगा।
उक्त प्रस्तावित संशोधन विधेयक का अधिवक्ता संघ ने पुरजोर विरोध करता है। इस प्रस्तावित विधेयक के विरोध में अधिवक्ताओं संघ के द्वारा एक दिवसीय कार्य से विरत रहकर अपना शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किया। वकीलों के न्यायालयीन कार्यों में भाग न लेने से पक्षकारों को परेशानी का सामना करना पड़ा। पक्षकारों ने स्वयं जाकर पैरवी के लिए अगली तारीख ली। यह भी पता चला है कि इस अधिनियम में संशोधन के लिए जो बैठक हुई थी, उसमें तय किए गए संशोधन के अलावा सरकार ने नए संशोधन लागू कर दिए। इनका ही सब जगह विरोध किया जा रहा है।
-रितेश मोदी, अध्यक्ष, अभिभाषक संघ, मुंगावली
- वकीलों को हड़ताल और बहिष्कार का संवैधानिक अधिकार दिया जाए।
- झूठी शिकायतों के खिलाफ वकीलों की सुरक्षा का प्रावधान जोड़ा जाए।
- बार काउंसिल के निर्णयों को न्यायिक समीक्षा के तहत लाया जाए।
Published on:
22 Feb 2025 09:18 am
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