
ईसागढ किला
ईसागढ. शासन से संरक्षण न मिलने के कारण ईसागढ का सालों पुराना ऐतिहासिक किला धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोता जा रहा है, या यूं कहें कि अपने अस्तित्व को मिटता देख ऐतिहासिक किला सिसक रहा है। ईसागढ़ का किला आज भी अपने आंचल में कई इतिहास समेटे हुए है लेकिन मौसम की मार और शासन की बेरूखी के चलते यह महत्वपूर्ण ऐतिहासिक इमारत नष्ट होती जा रही है। किले के संरक्षण के लिए शहरवासियों ने सुझाव दिए और नगरवासियों से नगर की धरोहर संभारने के लिए आगे आने की अपील की गई।
किले में शिल्पकारी की अदभुत कलाकारी देखने को मिलती है। जहां पत्थर के खंभों पर पुरातत्व महत्व के बेल बूटों की झलक साफ नजर आती है। इसके अलावा अंदर कई धार्मिक स्थल मौजूद हैं। किले से लगी हुई कई बावडिय़़ां भी हैं। इन बावडिय़़ों में भी शिल्पकला का अद्भुत नमूना देखने को मिलता है। इसके अलावा एक बगीचे में अंग्रेज शासक की कब्र है। जो ईसागढ़ पर अंग्रेजी शासन का जीता जागता प्रमाण माना जाता है। पिछले माह किले की ऊपरी मंजिल धराशायी हो गईं और कुछ भवन पहले भी जीर्णशीर्ण हो चुके है, लेकिन कोई भी इन भवन इमारतों के संरक्षण के लिए आगे नहीं आया है। किले की सार संभाल नहीं होने के कारण यह किला जर्जर होता जा रहा है।
२५ साल पहले थाना संचालित था, अब नशेलचियों का अडडा बना
लगभग 2५ साल पहले तक किले के अंदर थाना संचालित होता था। तब तक किले का रख रखाब भी होता रहा। लेकिन थाना दूसरी जगह थानास्थानांतरित होते ही किले की बदहाली के दिन शुरु हो गए। अब किले के अंदर नशेलचियों ने अड्ड़ा बना लिया है। बाहर भी कई लोग स्थाई अतिक्रमण कर रह रहे हैं। इस कारण ज्यादातर लोगों ने किले की ओर जाना ही बंद कर दिया।
ये है ईसागढ किले का इतिहास
कदवाया के युवा पुराविद हेमंत दुबे ने बताया कि सन 1808 ईस्वी में दुर्जनशाल खींची ने ओंडिला पर कब्जा कर लिया और एक छोटे किले एवं एक तालाब का निर्माण कराया। साथ ही एक नयी बस्ती का निर्माण कर उसका नाम बहादुरगढ़ रखा जिसे बाद में हनुमान गढ़ भी कहा गया, लेकिन जल्द ही सिंधिया की सेना ने जॉन वेप्टिस के नेतृत्व में हनुमान गढ पर हमला किया। दुर्जनशाल खींची को पराजित कर दिया। इसके बाद इसका नाम ईसागढ़ रखा गया। साथ ही इसे सिंधिया स्टेट में सूबा बनाया गया, लेकिन समय के साथ साथ इस स्थान का महत्व घटता गया। लेकिन 1901 में ईसागढ़ परगने से स्टेट को 18 लाख रूपय की मालगुजारी प्राप्त होती थी ईसागढ़ नगर की उस समय जनसंख्या 2688 थी फिर भी 1909 तक जिला होने का रूतबा ईसागढ़ का रहा जिसके बाद में बजरंगगढ और 1937 में गुना स्थापित कर दिया गया। वर्तमान में ईसागढ़ एक तहसील मात्र रह गया। बड़ा सवाल यह है कि इतने संघर्षों लड़ाईयों और इतिहास के साक्षी यह मध्यकालीन किला भवन इमारत यंू ही नष्ट होता नजर आ रहा है।
इनका कहना है
ईसागढ़ किले पर किसी का ध्यान नही है। यह किला हमारी धरोहर है। हम सभी को इसके जीर्णोद्धार के लिए मिलकर प्रयास करना चाहिय। पिछले दिनों भी कुछ लोगों द्वारा प्रयास किया गया किया गया था। अब पुरजोर के साथ प्रयास करना है जिससे प्राचीन धरोहर को सुरक्षित किया जा सके।
सुनील कुमार अग्रवाल, विधायक प्रतिनिधि
ईसागढ़ का प्राचीन किला व बावड़ी आज भी अपने पुनरुत्थान के लिए शासन की बाट जो रहा है। पुरातत्व विभाग ने इसकी कभी सुध नहीं ली। हम लोगों ने पूर्व में कई बार इसके जीर्णोद्धार के लिए शासन से मांग की लेकिन कुछ नही हुआ। अब हम शासन से उम्मीद लगाए हैं कि इसका पुनरुद्धार शीघ्र हो और किले के ऊपर पड़ा हुआ मलवा जल्द ही हटाया जाए। महादेव सिंह यादव, पूर्व मंडल अध्यक्ष भाजपा
शासन स्तर पर जब तक प्राचीन किले का जीर्णद्धार नहीं होता तब तक पर्यटन की दृष्टि से देखते हुए नगर परिषद द्वारा नियमानुसार किले के प्रांगण में सुंदर गार्डन का निर्माण कराना चाहिए। शहरवासियों को एक साथ आकर किले के जीर्णद्धार के लिए प्रयास कर आगे आना चाहिए।
प्रदीप सेन, समाजसेवी
वर्जन
मेरी जानकारी में ईसागढ़ का किला है जो क्षतिग्रस्त अवस्था में है। हमारी सरकार आने पर हम इस प्रोजेक्ट पर काम करेंगे।
गोपाल सिंह चौहान, विधायक चंदेरी
पुरातत्व विभाग का एक अलग से डिपार्टमेंट होता है। उस डिपार्टमेंट के अधिकारियों को इस ओर ध्यान देना चाहिए। उन्हें एक संरक्षण बना कर जो फं ड आता है उससे उसका जीर्णोद्धार करवाना चाहिए। फं ड नहीं आता तो ऊपर अधिकारियों से बात करके फं ड की मांग करना चाहिए।
विजय यादव, एसडीएम ईसागढ़
Published on:
19 Feb 2022 09:22 pm
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