
पाकिस्तान चुनावः इन 6 चुनौतियों से पार पाएगा, वही सत्ता पर कब्जा जमाएगा
इस्लामाबाद। पाकिस्तान में आने वाली 25 तारीख को आम चुनाव होने हैं। जिसके लिए मैदान में उतरी सभी राजनीतिक पार्टियां ने अपनी पूरी जान लगा दी है। उम्मीदवारों के नामांकन दाखिल होने और रद्द होने, रैलियों और जुलूसों के दौर के बीच चुनाव जीतने वाले उम्मीदवारों के नामों पर भी कयास लगाने का दौर जारी है।
पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट की ओर से नवाज शरीफ को द्वारा अयोग्य ठहराए जाने के बाद होने वाले पहले आम चुनाव कई मायनों में खास है। चुनाव परिणाम के बारे में कई विशेषज्ञों की राय और राजनीतिक समीक्षकों के विश्लेषण के अनुसार इस बार ऐसे कई कारक हैं, जो इस बार के परिणाम की दिशा निर्धारित करेंगे। हम आपको ऐसे ही छह मुद्दों के बारे में बताने जा रहे हैं।
आतंकवाद पर लगाम या हाफिज सईद की फतेह
इस बार के चुनाव में कई चर्चित उम्मीदवारों में से एक उम्मीदवार हाफिज सईद है। जो भारत और अमरीका जैसे देशों के अपराधिक सूची में शामिल हैं। इसके अलावा पेरिस स्थित बहुपक्षीय संगठन वित्तीय कार्यवाई बल (एफएटीएफ) ने हाल ही में पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में डाला है। ऐसे में ये देखना होगा कि क्या पाकिस्तान की जनता हाफिज सईद की पार्टी मुस्लिम लीग(एमएमएल) को अपना बहुमत देकर उन्हें और आतंकवाद का वर्चस्व कायम रखने में मदद करती है। या ये चुनाव इस मुद्दे पर आने वाले समय के लिए पाक रूख तय करेगी।
नवाज शरीफ पर कोर्ट का फैसला
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनकी बेटी मरियम को भ्रष्टाचार मामले में गिरफ्तार किया गया है। वहीं 2016 के पनामा पेपर्स मामले में पिछले साल 28 जुलाई को पाक के सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें प्रधानमंत्री पद से आयोग्य करार दिया था। इस फैसले के बाद हालांकि शरीफ चुनाव तो नहीं लड़ सकते हैं लेकिन लोगों में अभी भी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) का नवाज ही चेहरा हैं। विशेषज्ञों की माने तो इस चुनाव के परिणाम में नवाज शरीफ का नारा 'मुझे क्यों निकाला' एक अहम मुद्दा होगा। दरअसल आशंका जताई जा रही है कि जनता को अगर ये लगता है कि उन्हें गैर-कानूनी तरीके से हटाया गया तो उनकी पार्टी अच्छे अंतर से जीतेगी। वहीं पिछले साल उनकी पत्नी को कैंसर होने का पता चला था, जो इस समय लंदन में वेंटिलेटर पर हैं। ये भी वजह है कि मतदाताओं को उनसे और उनकी पार्टी से सहानुभूति है।
धार्मिक अधिकारों के लिए मंथन
किसी भी चुनाव के परिणाम को निर्धारित करने में धर्म एक महत्वपूर्ण कारक बनता जा रहा है। अन्य देशों की तरह पाकिस्तान में भी ये मुद्दा अछूता नहीं है। दरअसल वहां हाल ही में कई धार्मिक-राजनीतिक गठजोड़ों का उदय देखने को मिला है। यही वजह है कि पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पीएमएल-एन और पूर्व क्रिकेटर इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के बीच कड़ा मुकाबला माना जाता है और चुनावों में धार्मिक गठबंधन का रोल बढ़ता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि, 'देश की राजनीति में धर्म सबसे शक्तिशाली ईंधन होता है।'
सेना का दबदबा
कुछ समय पहले पाकिस्तान सेना के प्रवक्ता का एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस के दौरान बयान आया था कि बेशक चुनाव कराना चुनाव आयोग का विशेषाधिकार है, लेकिन इसके बावजूद भी जानकारों की राय है कि पाकिस्तान में अभी भी सेना सबसे शक्तिशाली राजनीतिक साझीदार है। सबका यही मानना है कि सेना की रुचि ही पहले भी किसी राजनीतिक दल की हार या जीत का मुख्य कारण रही है, और अागे भी फौज ही सत्ता का रूख निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाएगी।
मीडिया में फेक न्यूज का प्रसार
जानकारों का कहना है कि मीडिया चाहे वो सोशल मीडिया हो या मुख्यधारा का मीडिया, उनमें चलने वाली खबरें और फेक न्यूज भी चुनावी प्रक्रिया में उतार-चढाव लाने में मुख्य कारण हैं। हालांकि, सोशल मीडिया की पहुंच कम लोगों तक होने के कारण मुख्यधारा का मीडिया ही चुनावों में लोगों की राय को प्रभावित करेगा। बता दें कि केवल 10 से 15 प्रतिशत लोगों तक ही सोशल मीडिया की पहुंच है।
अर्थव्यवस्था और विकास का मुद्दा
पाकिस्तान में चुनाव के दौरान रोजगार, बिजली, मूलभूत विकास के मुद्दे भी मतदाताओं के लिए खास हैं। लोग जानना चाहते हैं कि कौन-सा उम्मीदवार उनके इन मुद्दों को ज्यादा बेहतर उठा सकते हैं।
Published on:
22 Jul 2018 11:10 am
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