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चार बजे उठकर 17 शृंगार करते हैं नागा साधु, संन्यास से पहले बनाते हैं नपुंसक

साधुओं का संसारिक जीवन और भोग-विलास से कोई नाता नहीं होता। नागाओं का जीवन जितना रहस्यमय है, उतना ही मुश्किल भी होता है।

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Rajeev sharma

Apr 14, 2016

naga sadhu

naga baba

भोपाल। नागा साधुओं के जीवन से जुड़े रहस्य जानने के लिए हर इंसान लालायित रहता है। साधुओं का संसारिक जीवन और भोग-विलास से कोई नाता नहीं होता। नागाओं का जीवन जितना रहस्यमय है, उतना ही मुश्किल भी होता है। नागा साधु बनने के लिए बहुत कठिन परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। जानिए नागाओं के जीवन से जुड़े रहस्य...

नहीं पहनते कपड़े

नागा साधुओं का मानना है कि कपड़े महज तन ढ़कने का काम करते हैं, और नागाओं के लिए कपड़ों का कोई महत्व नहीं होता है। नागाओं को शरीर से व भौतिक चीजों से कोई लगाव नहीं होता है। नागा आत्मा की पवित्रता पर यकीन करते हैं और शरीर को नश्वर मां कपड़ों का परित्याग करते हैं।

17 शृंगार कर सजते हैं नागा

नागा साधु 17 तरह के शृंगार से स्वयं को सजाते हैं। सिंहस्थ में तेरह अखाड़ों के हजारों नागा साधु आएंगे। सभी के लिए इनका श्रृंगार अनूठा व आकर्षण का केंद्र रहता है, जिसकी अपनी एक अलग विधि है। वे विशेष अवसरों पर ही ऐसा सजते हैं और अपने ईष्ट देव विष्णुजी या शंकरजी की आराधना करते हैं। इनका 17वां शृंगार बहुत खास माना जाता है, जो इन्हें महिलाओं से एक कदम आगे रखता है। वह है भस्मी अर्थात भभूति शृंगार।

नागाओं की दिनचर्या

नागा साधु सुबह चार बजे बिस्तर छोड़ देते हैं। नित्य क्रिया व स्नान के बाद नागाओं का पहला काम श्रृंगार करना होता है। इसके बाद हवन, ध्यान, बज्रोली, प्राणायाम, कपाल क्रिया व नौली क्रिया नागाओं का महत्वपूर्ण काम है। भोजन के नाम पर नागा दिनभर में एक बार शाम को भोजन कर सोने चले जाते हैं।

संन्यास से पहले लिंग भंग

नागाओं को 24 घंटे नागा रूप में अखाड़े के ध्वज के नीचे बिना आहार के खड़ा होना पड़ता है। इस दौरान उनके कंधे पर एक दंड और हाथों में मिट्टी का बर्तन होता है। इस प्रक्रिया के दौरान अखाड़े के पहरेदार उन पर नजर भी रखते हैं। इसके बाद अखाड़े के साधु दीक्षा ले रहे नागा के लिंग को वैदिक मंत्रों के साथ झटके देकर निष्क्रिय कर देते हैं। इस प्रक्रिया को पूरा करने के बाद ही वह नागा साधु बन पाता है।

नागाओं का इतिहास

कहा जाता है कि वेद व्यास ने संगठित रूप से सबसे पहले वनवासी संन्यासी परंपरा की शुरुआत की थी। इसके बाद शुकदेव ने, फिर अनेक ऋषि और संतों ने इस परंपरा को अपने-अपने तरीके से आगे बढ़ाया। बाद में शंकराचार्य ने चार मठ स्थापित कर दसनामी संप्रदाय का गठन किया। इसके बाद ही अखाड़ों की परंपरा शुरू हुई।

नागा बनाते हैं 7 अखाड़े

संतों के तेरह अखाड़ों में सात संन्यासी अखाड़े ही नागा साधु बनाते हैं। इनमें जूना, महानिर्वणी, निरंजनी, अटल, अग्नि, आनंद और आवाहन अखाड़ा शामिल है। सिंहस्थ कुंभ में ये सभी अखाड़े शिरकत करेंगे।

कहां रहते हैं नागा साधु

नागा साधु अखाड़े के आश्रम और मंदिरों में धुनी रमाते हैं। कुछ तप के लिए हिमालई क्षेत्रों में मौजूद मंदिरों या ऊंचे पहाड़ों की गुफाओं में जीवन बिताते हैं। अखाड़े के आदेशानुसार यह पैदल भ्रमण भी करते हैं। नागा मैदानी हिस्सों और पहड़ों पर एक सा ही जीवन व्यतीत करते हैं।

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