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अर्जुन को ही नहीं, इन 2 योद्धाओं को भी दिया था कृष्ण ने ज्ञान

 माना जाता है कि युद्धभूमि में उन्होंने दो और व्यक्तियों को ज्ञान दिया था और उनकी गलतियों का अहसास कराया था। 

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महाभारत का हर श्लोक मानव को सत्य की शिक्षा देता है। पांडव सत्यमार्ग पर चले, इसलिए जनमानस में वे आज भी आदरणीय हैं। कौरव कुमार्ग पर चलने के कारण कलंक के पात्र बने और युद्ध में उनका नाश हुआ।

इस पवित्र ग्रंथ की हर घटना शिक्षाप्रद है। युद्ध में श्रीकृष्ण अर्जुन के सारथी बने और उन्हें गीता का ज्ञान दिया। माना जाता है कि युद्धभूमि में उन्होंने दो और व्यक्तियों को ज्ञान दिया था और उनकी गलतियों का अहसास कराया था।

अगर ये अपने कर्तव्य का पूर्णत: निर्वहन करते तो संभवत: महाभारत की नौबत नहीं आती। ये दो व्यक्ति थे - पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य। पांडव भी इनका बहुत सम्मान करते थे परंतु युद्ध में ये उनके शत्रु पक्ष की ओर से लड़े थे।

कौरवों द्वारा अन्याय की अनेक घटनाओं को अंजाम देने के बावजूद कृष्ण उनसे उतने क्रोधित नहीं थे, जितने वे द्रोणाचार्य व भीष्म से थे। कृष्ण स्वयं महाकाल हैं। इसलिए समय पर उनका पूर्ण नियंत्रण है। कुरुक्षेत्र में भी उन्होंने कालचक्र को कुछ देर के लिए विराम देकर द्रोणाचार्य एवं भीष्म को यह बताया था कि अगर वे चाहते तो युद्ध नहीं होता, असंख्य लोग मृत्यु का ग्रास नहीं बनते।


द्रोणाचार्य से कौरवों ने युद्धविद्या सीखी थी लेकिन वे उन्हें सत्य की रक्षा का सबक देना भूल गए थे। अगर द्रोणाचार्य कौरवों को यह शिक्षा देते कि वे अपने शस्त्रों को सिर्फ सत्य की रक्षा करने के लिए उठाएंगे, तो देश का भविष्य कुछ और होता।

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इसी प्रकार पितामह भीष्म भी कौरवों के साथ थे परंतु वे अपनी प्रतिज्ञा से ही बंधे रहे। अगर प्रतिज्ञा के बजाय वे सत्य का पक्ष लेते तो कौरवों को मनमानी करने का मौका नहीं मिलता। इसके पश्चात द्रोणाचार्य एवं भीष्म को अपनी गलतियों का अहसास हुआ लेकिन तब तक समय निकल चुका था और युद्ध में भयंकर नरसंहार हुआ।

इस घटना से यह शिक्षा मिलती है कि गुरु और वरिष्ठ लोगों का स्वयं सन्मार्ग पर चलना ही पर्याप्त नहीं है, वे बच्चों को भी सत्यपथ पर चलने की शिक्षा दें।