
मिट्टी के नीचे दबा एक बीज अपने खोल में आराम से सो रहा था। उसके बाकी साथी भी अपने अपने खोल में सिमटे पड़े हुए थे। तभी अचानक एक दिन बरसात हुई, जिससे मिट्टी के ऊपर कुछ पानी इकट्ठा हो गया और सारे बीज भीग कर सड़ने लगे।
वह बीज भी तर-बतर हो गया और सड़ने लगा। बीज ने सोचा, इस तरह तो मैं एक बीज के रूप में ही मर जाऊंगा। मेरी हालत भी मेरे दोस्तों की तरह ही हो जाएगी, जो अब खत्म हो चुके हैं। मुझे कुछ ऐसा करना चाहिए कि मैं अमर हो जाऊं?
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बीज ने हिम्मत दिखाई और पूरी ताकत लगाकर अपना खोल तोड़ कर खुद को एक पौधे के रूप में परिवर्तित कर लिया। अब बरसात और मिट्टी उसके दोस्त बन चुके थे और नुकसान पहुंचाने की जगह बड़े होने में उसकी मदद करने लगे।
धीरे-धीरे वह बड़ा होने लगा। एक दिन वह स्थिति आई जब वह इतना बड़ा हो गया कि अब और नही बढ़ सकता था। उसने मन ही मन सोचा, इस तरह यहां खड़े-खड़े मैं एक दिन मर जाऊंगा पर मुझे तो अमर होना है।
यह सोचकर उसने खुद को एक कली के रूप में परिवर्तित कर लिया। कली बसंत में खिलने लगी। उसकी खुशबू दूर-दूर तक फैल गई, जिससे आकर्षित होकर भंवरे वहां मडराने लगे।
इस प्रकार इस पौधे के बीज दूर-दूर तक फैल गए और वह एक बीज जिसने परिस्थितियों के सामने हार न मानकर खुद को परिवर्तित करने का फैसला किया था, दोबारा लाखों बीजों के रूप में जीवित हो गया।
परिवर्तन को एक घटना की तरह नही, बल्कि एक प्रक्रिया की तरह देखना चाहिए। यह मिटाने की जगह मजबूत बनाता है और हम प्रगतिशील हो जाते हैं।
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Published on:
27 Oct 2015 03:45 pm
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