चरणामृत और पंचामृत लेने के चमत्कारिक फायदे, जानिए इनसे जुड़े नियम

भगवान विष्णु के चरणों का अमृतरूपी जल सभी तरह के पापों का नाश करने वाला है।
ऐसा कहा जाता है कि जो चरणामृत का सेवन करता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता है।

By: Shaitan Prajapat

Published: 21 Jan 2021, 09:16 AM IST

जब भी कोई मंदिर में जाता है तो पंडितजी उसे चरणामृत और पंचामृत देते हैं। लगभग सभी लोगों ने दोनों ही पीया होगा। लेकिन बहुत कभी ही लोग इसकी महिमा और इसके बनने की प्रक्रिया को नहीं जानते होंगे। चरणामृत का अर्थ होता है भगवान के चरणों का अमृत और पंचामृत का अर्थ पांच अमृत यानी पांच पवित्र वस्तुओं से बना अमृत के समान पदार्थ होता है। को ही पीने से व्यक्ति के भीतर जहां सकारात्मक भावों की उत्पत्ति होती है वहीं यह सेहत से जुड़ा मामला भी है। चरणामृत और पंचामृत आपके जीवन में चमत्कारिक फायदे ला सकते हैं। आज आपको दोनों के दायदे के बारे में बताते है।

चरणामृत का सेवन से नहीं होता पुनर्जन्म
शास्त्रों में कहा गया है कि अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्। विष्णो पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते।। अर्थात भगवान विष्णु के चरणों का अमृतरूपी जल सभी तरह के पापों का नाश करने वाला है। इसको औषधि के समान माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जो चरणामृत का सेवन करता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता है। चरणामृत लेने के नियम भी होते हैं। चरणामृत ग्रहण करने के बाद बहुत से लोग सिर पर हाथ फेरते हैं। वहीं, शास्त्रीय मत के अनुसार, ऐसा नहीं करना चाहिए। इससे नकारात्मक प्रभाव बढ़ता है। चरणामृत हमेशा दाएं हाथ से लेना चाहिए और श्रद्घाभक्तिपूर्वक मन को शांत रखकर ग्रहण करना चाहिए। इससे चरणामृत अधिक लाभप्रद होता है।

कैसे बनता चरणामृत
तांबे के बर्तन में चरणामृतरूपी जल रखने से उसमें तांबे के औषधीय गुण आ जाते हैं। चरणामृत में तुलसी पत्ता, तिल और दूसरे औषधीय तत्व मिले होते हैं। मंदिर या घर में हमेशा तांबे के लोटे में तुलसी मिला जल रखा ही रहता है। आयुर्वेद के अनुसार चरणामृत स्वास्थ्य के लिए बेहद अच्छा माना गया है। तांबे में अनेक रोगों को नष्ट करने की क्षमता होती है। यह पौरूष शक्ति को बढ़ाने में भी गुणकारी माना जाता है। तुलसी के रस से कई रोग दूर हो जाते हैं और इसका जल मस्तिष्क को शांति और निश्चिंतता प्रदान करता हैं।

पंचामृत का अर्थ है
पांच अमृत यानी दूध, दही, घी, शहद, शकर को मिलाकर पंचामृत बनाया जाता है। इसी से भगवान का अभिषेक किया जाता है। पांचों प्रकार के मिश्रण से बनने वाला पंचामृत कई रोगों में लाभदायक और मन को शांति प्रदान करने वाला होता है। इसका एक आध्यात्मिक पहलू भी है। वह यह कि पंचामृत आत्मोन्नति के 5 प्रतीक हैं।

दूध पंचामृत का प्रथम भाग है। यह शुभ्रता का प्रतीक है अर्थात हमारा जीवन दूध की तरह निष्कलंक होना चाहिए।

दही का गुण है कि यह दूसरों को अपने जैसा बनाता है। दही चढ़ाने का अर्थ यही है कि पहले हम निष्कलंक हो सद्गुण अपनाएं और दूसरों को भी अपने जैसा बनाएं।

घी स्निग्धता और स्नेह का प्रतीक है। सभी से हमारे स्नेहयुक्त संबंध हो, यही भावना है।

शहद मीठा होने के साथ ही शक्तिशाली भी होता है। निर्बल व्यक्ति जीवन में कुछ नहीं कर सकताए तन और मन से शक्तिशाली व्यक्ति ही सफलता पा सकता है।

शकर का गुण है मिठास, शकर चढ़ाने का अर्थ है जीवन में मिठास घोलें। मीठा बोलना सभी को अच्छा लगता है और इससे मधुर व्यवहार बनता है। उपरोक्त गुणों से हमारे जीवन में सफलता हमारे कदम चूमती है।

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