
तोलियासर गांव स्थित मिट्टी से अटा पक्का जोहड़। फोटो- पत्रिका
बीकानेर/ठुकरियासर। बूंद-बूंद गागर भी भरती है और सागर भी। इसी सोच के साथ बरसात की एक-एक बूंद को अपने एंव पशुधन की प्यास मिटाने के लिए बुजुर्गों की ओर से निर्माण किए गए प्राचीन जल संरक्षण स्त्रोत अनदेखी के चलते अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे हैं। एक ओर जहां भूजल स्तर दिनों दिन नीचे गिरता जा रहा है और जनमानस पेयजल समस्या से जूझ रहा है। गर्मी की दस्तक हुई की हर ओर पानी के लिए हायतौबा मच जाती है।
दूसरी तरफ सुविधा और निज स्वार्थ के चलते सदियों तक तालाब-तलइयां को ईश्वर स्वरूप मान कर पूर्वजों की जल व्यवस्था को बिसरा दिया है। संकुचित हो रहे पायतन, खनन एवं रेत से अटे जोहड़ वर्षों तक सेवाएं देने के बाद अपनी बदहाली पर सुबकते नजर आ रहे हैं।
इस मरु भूमि में रेतीले टीबों के बीच जल स्तर काफी नीचे होने व खारे पानी की अधिकता वा प्राचीन काल में पुरखों ने सीमित संसाधनों व भामाशाहों के सहयोग से रेत के समुद्र को मथकर पानी की हर बूंद को जुटाया। अपने व पशुधन की बारहों महीने प्यास बुझाने के लिए प्राकृतिक बनावट में जहां समतल भूमि मिली, वहीं इन तालाब-तलाइयों का निर्माण कर बरसाती पानी की एक-एक बूंद को संग्रहित किया।
रेगिस्तानी इलाकों में पानी केवल जरूरत नहीं, बल्कि एक गहरी संस्कृति और जीवन-संघर्ष की कहानी है। सांस्कृतिक-धार्मिक परंपराओं को जीवित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। इन स्रोतों को पानी के उपयोग में लेने के साथ-साथ इनकी समय-समय पर साफ-सफाई, पूजा अर्चना करने व वर्षा काल से पूर्व हवन कर भगवान इन्द्र का आह्वान करने की परम्परा रही, लेकिन समय की बदलती करवट में सरकार की ओर से गांवों में विभिन्न योजनाओं के तहत सरल एवं सुगमता से जल संसाधन मुहैया करवाने के कारण लोगों ने इस प्राचीन परम्परागत जल स्रोतों को बिसरा दिया है।
जल-संरक्षण और जीवन का आधार थार मरुस्थल में वर्षा की अनिश्चितता को देखते हुए बारिश की हर एक बूंद को सहेजने के लिए तालाब महत्वपूर्ण हैं। रियासतकाल में भी इन तालाबों के माध्यम से भू-जल स्तर को बनाए रखा जाता था, जिससे आस-पास के कुओं में पीने का पानी उपलब्ध होता था। गांवों आज भी एक नहीं कई कच्चे-पक्के जोहड़ है। जन स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग से मिले आंकड़ों के अनुसार श्रीडूंगरगढ़ उपखण्ड क्षेत्र के कई गांवों का जलस्तर एक हजार फीट से ज्यादा नीचे चला गया है और गिरते भूजल स्तर की वजह से नलकूपों में प्रतिवर्ष पाइपों की संख्या बढ़ानी पड़ रही है।
सामाजिक सरोकार में अग्रणी संस्था आपणो गांव सेवा समिति के शूरवीर मोदी ने बताया कि दिनोंदिन जलस्तर गिर रहा है, नलकूप नकारा हो रहे हैं। ऐसे हालात में बरसाती जल स्त्रोतों की जरूरत महसूस होगी। इनमें कई जोहड़ तो रजवाड़ों के समय में बने हैं। अधिकांश जोहड़ मिट्टी से अटे हैं, कुछ जोहड़ में मरम्मत, पायतन का समतलीकरण कार्य की जरूरत है। इनके सुरक्षा, सरंक्षण के साथ साथ संवर्धन की ओर सरकार एवं जनप्रतिनिधि अपना ध्यान दें तो इनकी कायाकल्प हो जाएगी।
श्रीडूंगरगढ़ के साहित्यकार व लेखक सत्यदीप ने बताया कि श्रीडूंगरगढ़ उपखंड के 96 गांवों में अधिकांश गांवों के आगे सर शब्द लगा है। यह परम्परा करीब 900 साल से चली आ रही है। रेगिस्तानी इलाका होने के कारण यहां पानी की बहुत ज्यादा महता रही है। गांवों की बसावट में गांव के आगे 'सर' शब्द लगाने का अर्थ था कि इस गांव में तालाब है, क्योंकि पशुधन व खेती ही जीविकोपार्जन का मुख्य अंग होने से गांवों की बसावट पेयजल सुविधा के पास होती रही।
Updated on:
19 May 2026 12:27 pm
Published on:
19 May 2026 12:24 pm
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