
यूपी के इस जिले में फल फूल रहा थाईलैंड का अमरूद, भेंट कलम तकनीक से तैयार किए जा रहे पौधे
औरैया. सात समंदर पार कर बागबानी के इतिहास में जिले का नया अध्याय जुड़ गया है। जंहा एक नर्सरी के मालिक ने अपने भागीरथी प्रयास से हाइब्रिड नस्ल के अमरुद को थाईलैंड से आयात कर देशी पौधे में भेंट कलम तकनीक से काले अमरुद उगाने का सपना सच कर डाला है। जिला मुख्यालय से 30 किलोमीटर दूर नेशनल हाइवे पर स्थित कुशवाहा नर्सरी के मालिक शिवकुमार बताते हैं कि उन्होंने इंटरनेट पर थाईलैंड के प्रसिद्ध अमरुद के बारे में गहराई से जानकारी कर कलकत्ता के एक नर्सरी व्यापारी से सम्पर्क कर इसकी पौध मंगवाने में सफल साबित हुए। जिसमें शैशव अवस्था में ही छोटे छोटे काले जामुन के आकार के फल लगे हुए थे। जिसको बताए अनुसार अपने बाग में कड़ी मेहनत के बल पर जिन्दा रखने में कामयाब रहे।
आय के मामले में भी भरपूर फायदा उठा सकते किसान
उन्होंने बताया कि मंगाए गए पौधों में मात्र 3 पौधों को ही बचा पाने में कामयाब रहे मगर लगन और मेहनत के बल पर बुलन्द इरादों ने अमरुद की इस विदेशी किस्म को विकसित करने के लिए आम की प्रचलित भेंट कलम तकनीक के बल पर देशी अमरुद के पौधे में तैयार कर पाना संभव हो पाया। प्रगतशील किसान शिवकुमार का दावा है कि यह किस्म किसी भी जलवायु और ऊसर अथवा क्षारीय अथवा अम्लीय मिट्टियों को छोड़कर कंही भी उगाया जा सकता है। जोकि अपनी निश्चित आयु 50 दिन के अंदर फल देने शुरू कर देता है और विकसित फल के लिए पौधे का विकास 3 वर्ष में 1 से 2 किलोग्राम तक का फल लाल गूदेदार होता है। जोकि खाने में काफी स्वादिस्ट होता है और जिसका टेस्ट कुछ कुछ तरबूज से मिलता जुलता होता है। पूंछने पर बताया कि यह पूर्ण विकसित होकर साल में दो बार शरद और वर्षा ऋतु में और औसतन एक पेड़ 800 से 900 फल देता है जबकि आम तौर देशी अमरूद के पेड़ में यह सम्भव नहीं है। इस लिहाज से किसान आय के मामले में भी भरपूर फायदा उठा सकते हैं।
पक्षियों से नही होता नुकसान
दावा किया जाता है कि इस प्रजाति के अमरूदों को पशु, पक्षी बन्दर, तोता और गिलहरी आदि नुकसान नहीं पहुंचाती है। कारण साफ है कि इसकी पहचान और देशी अमरुद का स्वाद न होना है। साथ ही बाजार में ऊंची कीमतों में इसका क्रय विक्रय लाभ के दृष्टिकोण से उत्तम ही उत्तम है
ऐसे तैयार होता है पौधा
देशी अमरूद के पौधे को पॉलीथिन में करके सावधानी से जड़ को तने से अलग कर पैने ब्लेड अथवा कैंची से थाईलैंड से आयातित पौधे के अग्रिम भाग को काटकर उसे उसी जगह जैविक खाद और गोबर को लेकर कटे हुए भाग से जोड़ दिया जाता है। साथ ही साथ नियमित रूप से पानी और कीटनाशक का छिड़काव लगातार 15 से 20 दिन करने के बाद पौधे की शंकर किस्म के तौर पर यह प्रजाति तैयार हो जाती है। जिसे रोपित करने के 50 दिन बात छोटे से आकार में फल प्राप्त होने लगते एमजीआर पूर्ण विकसित फल के लिए 3 से 4 वर्ष का इंतजार करना पड़ता है।
Published on:
14 Jun 2018 10:32 pm
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