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‘जीवन में राम’ भाग 4: कृतज्ञता है श्रीराम के व्यक्तित्व का उज्ज्वल पक्ष

सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास के आचार्य मिथिलेश नन्दिनी शरण की राम मंदिर पर आलेख श्रृंखला जीवन में राम के चौथा भाग में प्रभु श्रीराम के चरित्र की विशेषता...

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जीवन में राम

जन्म से मृत्य-पर्यन्त मनुष्य अपने अस्तित्व को अन्यों की उपस्थिति से परिभाषित करता है। माता, पिता, गुरु, मित्र तथा समाज के अनेक संबंध हैं जिनसे मनुष्य का जीवन जीने योग्य बन पाता है। सुख, समृद्धि और सफलता पाने के क्रम में जिनका साथ-सहयोग और सौजन्य पाया जाता है, उनके महत्त्व को स्वीकारना और उनके प्रति विनम्र होना अच्छे मनुष्य का गुण है। मानवीय चरित्र की यह विशेषता है कृतज्ञता। श्रीराम कृतज्ञता के अनूठे उदाहरण हैं। महर्षि वाल्मीकि कहते हैं - मन को अपने वश में रखने के कारण किसी के सैकड़ों अपराधों का भी स्मरण न करते हुए, किसी प्रकार किए गए स्वल्प उपकार से ही वे संतुष्ट हो जाते हैं - कथञ्चिदुपकारेण कृतेनैकेन तुष्यति। न स्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तया॥

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कृतज्ञता श्रीराम के व्यक्तित्व का अत्यन्त उज्ज्वल पक्ष है। इससे चतुर्दिक विद्यमान लोग सहज ही अनुकूल हो जाते हैं। चित्रकूट में भरत से संवाद करते हुए वे कहते हैं कि हे भरत! हमारे पिता के न रहने से हमारी सभी बिगड़ती हुई बातों को गुरुदेव वशिष्ठ जी की कृपा ने संभाल लिया है।

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संकट के समय में गुरु वशिष्ठ और महाराज जनक ने सबकी रक्षा कर ली। श्रीराम अनुज भरत के प्रति भी अपने अहोभाव व्यक्त करते हैं। वनयात्रा में, प्रभु श्रीराम सुग्रीव, विभीषण, हनुमान् आदि के प्रति भी कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। इससे अभिभूत हुए हनुमान् श्रीराम की सेवा को ही जीवन-व्रत बना लेते हैं। श्रीजानकी का पता लगाकर लौटे हनुमान् से श्रीराम कहते हैं- सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी॥ प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा॥

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वस्तुत: कृतज्ञता सनातन धर्म को अभिव्यक्त करने वाला मुख्य गुण है। समुद्र लांघकर लंका जाते श्रीहनुमान् से मैनाक कहता है कि हे वानरश्रेेष्ठ! श्रीराम के पूर्वजों ने समुद्र की वृद्धि की थी और आप रघुवंशी श्रीराम का कार्य करने जा रहे हैं, अत: यह कृतज्ञ समुद्र आपका स्वागत करना चाहता है। क्योंकि जिसने पूर्व में हित किया है उसका श्रेय मानते हुए प्रत्युपकार करना ही सनातन धर्म है। श्रीराम राजसभा में भी वानर-सेना को लंका-विजय का श्रेय देते हैं। कृती कृतज्ञस्त्वमसि स्वभावत: समस्तकल्याणगुणामृतोदधि:। हे प्रभु! उपकार करने और मानने की विशिष्टता से युक्त आप समस्त कल्याण गुणों के समुद्र हैं।