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Ram Mandir Katha: अयोध्या के तीर्थ, जहां भगवान राम भी करते थे पूजन

Ram Mandir Katha: राम मंदिर कथा के पांचवे अध्याय में आज हम आपको बताएंगे अयोध्या के ऐसे तीर्थ के बारे में बताएंगे जहां भगवान राम, सीता भी पूजन किया करते थे। पढ़िए राहुल मिश्रा और मार्कण्डेय पाण्डेय की विशेष रिपोर्ट।

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भगवान राम की कुलदेवी मां देवकाली हैं। भगवान राम मां देवकाली का पूजन करते थे।

Ram Mandir Katha: आज हम आपको अयोध्या के ऐसे तीर्थ के बारे में बताएंगे जहां भगवान राम, सीता भी पूजन किया करते थे। लेकिन उसके पहले हम नागेश्वर नाथ मंदिर की चर्चा करेंगे जिसे भगवान राम के पुत्र कुश द्वारा निर्मित किया गया है।

महाराज कुश ने भगवान भोले शंकर से अयोध्या में विराजमान होने का वर मांगा था। सरयू नदी के किनारे स्थित नागेश्वरनाथ मंदिर के बारे में धर्मशास्त्रों में व्यापक वर्णन मिल जाता है। सरयू नदी के किनारे स्थित इस मंदिर पर हजारों लोग नियमित दर्शन करने आते हैं। वेद-पुराणों के अनुसार भगवान राम ने बैकुंठ लोक जाने से पहले अपने पुत्र कुश को कुशावती का राज्य दे दिया। साथ ही अपने परम धाम जाने के दौरान अयोध्या के समस्त नर-नारी, ऋषि-मुनि, पशु-पक्षी, जीव-जंतु को भी अपने साथ साकेत ले गए। इससे अयोध्या सूनी हो गई। उस समय मात्र तीर्थ और देवता ही अयोध्या में रह गए। सप्तपुरियों में शीर्ष पर रहने वाली अयोध्या उदास रहने लगी। एक दिन अयोध्यापुरी देवी का रूप धारण कर आधी रात को कुशावती नगरी में उस स्थान पर पहुंची, जहां महाराज कुश अकेले सो रहे थे।

तदायोध्या स्वयं गत्वा तदायोध्या स्वयं गत्वा ह्यर्धरात्रे कुशावतीम् । एकाकी च कुशो यत्र सुष्वाप नृपतिर्गृहे ॥ (श्रीरूद्रयामलोक्त, श्रीअयोध्या माहात्म्य, पांचवां अध्याय, श्लोक 4)


महाराजा कुश अपने शयनकक्ष में अति रूपवान युवती को देखकर काफी हैरान हुए और उनका परिचय पूछा। साथ ही कहा कि रघुकुल में जन्म लेने वाला कोई भी पुरुष दूसरी स्त्री के साथ गमन नहीं करता। इसलिये आप अपने आने का कारण बताएं। देवी का रूप धरे अयोध्या पुरी ने महाराज कुश से अपनी व्यथा बताया कि अपने परमलोक जाने के आपके पिता रामचंद्र जी ने मुझ अयोध्यापुरी के सभी निवासियों को अपने साथ ले गए और करोड़ों प्राणी भी उनके साथ स्वर्ग में चले गए। अयोध्यापुरी ने करुण स्वर में महाराज कुश से कहा कि आपमें सभी शक्तियां रहने पर भी मेरी यह दशा हो गई है और मैं शासक विहीन हो गई हूं। मेरी जो दशा आपके पिता ने की है वैसी आपके किसी पूर्वज ने नहीं की। अब तुम्हें अयोध्या में निवास करना चाहिए। अयोध्यापुरी के ऐसे निराश वचन सुन कुश सोच में पड़ गए और बोले कि इसमें मेरे पिता का कोई दोष नहीं है।

कुश ने अयोध्यापुरी को दोबारा बसाया
रात बीत जाने पर कुश ने मंत्रियों की सलाह से कुशावती नगरी ब्राह्मणों को देकर अयोध्या के लिए प्रस्थान कर दिया। उनके साथ बहुत बड़ी सेना भी थी। कुश ने अयोध्या पहुंच पूर्व की भांति अयोध्यापुरी को पुन: बसाया। एक दिन कुश सरयू नदी के जल में विहार कर रहे थे। उस दौरान नदी में कुमुद नामक नाग का निवास था। उस नाग की बहन, जिसका नाम कुमुद्वती था, अत्यंत सुंदर थी। कुश को देखकर वह उन पर मोहित हो गई और उनके हाथ से कंगन चुरा लिया।

कुमुद्वती च भगिनी तस्य नागस्य सुंदरी।

मोहिता रूपमालोक्य जहार करकङ्कणम् ॥

अयोध्या माहात्म्य- 17 ॥


जलक्रीड़ा कर रहे महाराज कुश को इस बात की जानकारी न हो सकी कि उनका कंगन चोरी हो गया है। वे विहार कर जब जल से बाहर आये, तो अपने हाथमें उस विजय- कंकण को गायब देखा, जिसको पूर्वकाल में अगस्त्य ने श्रीरामचन्द्र जी को दिया था।

कुमुद नाग की बहन कुमुद्वती ने चुराया था कंगन
कुश अपने पिता से प्राप्त कंगन गायब होने से काफी विचलित हो गए। उनकी सेना और उन्होंने स्वयं बहुत ढूंढा। असफल होने पर उन्होंने सम्पूर्ण नदी को सुखाने के लिए उन्होंने अभिमंत्रित तीखे बाण उठा लिए। इस घटना से सरयू नदी काफी भयभीत हो गईं और कुश के पांवों के पास पहुंच कर बताया कि वे दोषरहित हैं और उनका कंगन कुमुद नामक नाग की बहन कुमुद्वती ने चुराया है। महाराज कुश ने यह जानकारी मिलने के बाद उसके वध के लिए गरुड़ अस्त्र उठा लिया। कुमुद नाग और उसकी बहन कुमुद्वती कुश के चरणों में गिर गए और क्षमा याचना करने लगे।

शास्त्रों के अनुसार नागराज कुमुद भगवान शंकर का अनन्य भक्त था। अपने भक्त को संकट में देख भगवान भोलेनाथ भी प्रकट हो गए। भगवान भोलेनाथ ने कुश से कुमुद्वती से विवाह करने और वर मांगने की बात कही।

अयोध्या माहात्म्य के पांचवें अध्याय के 28 वें श्लोक में लिखा है....
स्वर्गद्वारे सदा तिष्ठ नागेश्वर प्रथमागम:।।


कुश ने भगवान भोलेनाथ से कहा कि हे भोलेनाथ, आप भक्तों की रक्षा के लिए सदा स्वर्गद्वार में निवास कीजिये तथा आपकी प्रसिद्धि नागेश्वरनाथ नाम से हो। उसी समय से भोलेनाथ स्वर्गद्वार में नागेश्वर नाथ के रूप में विराजमान हो गए। इस स्थान पर महराज कुश ने एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया था, जिसका जीर्णोद्धार महाराजा विक्रमादित्य ने कराया था।

बड़ी देवकाली: भगवान राम और उनके पूर्वज भी यहां करते थे पूजा
अयोध्या में एक ऐसा भी स्थान है, जहां स्वयं भगवान राम सहित उनका परिवार भी पूजा-अर्चना करता था। प्रभु श्रीराम की जन्मभूमि से करीब पांच किलोमीटर पश्चिम -दक्षिण में स्थित है भगवान राम की कुलदेवी मां देवकाली माता का भव्य मंदिर। यह मंदिर अत्यन्त ही भव्य और प्राचीन है। बड़ी देवकाली माता के विषय में कहा जाता है कि ये भगवान श्रीराम की कुल देवी हैं। श्रीराम का जन्म महाप्रतापी सम्राट इक्ष्वाकु कुल में हुआ था। बताते हैं कि महाराज इक्ष्वाकु ने ही बड़ी देवकाली मंदिर की स्थापना कराई थी। तभी से बड़ी देवकाली मंदिर में पहले श्रीराम के पूर्वज और फिर उनके बाद की पीढिय़ां पूजा अर्चना करते चले आए। मंदिर के पुजारी सुनील पाठक ने बताया कि राम जन्म के बाद माता कौशल्या ने उन्हें पहली बार यहीं माता का दर्शन कराया था। उसी परंपरा का पालन करते हुए लोग मंदिर में आज भी अपने नवजात बच्चों को एक माह के भीतर माता के दर्शन करने पहुंचते हैं।


मंदिर का प्रवेश द्वार मुख्य सडक़ से सटा हुआ है। द्वार ऊंचा है और इसकी दोनों ओर दो शेर की मूर्तियां बनी हैं। मध्य में एक मनुष्याकृति बनी हुई है। अंदर लंबी दूरी तय करने पर माता का पुन: एक दूसरा प्रवेश द्वार दिखाई पड़ता है। इस द्वार पर एक पीतल का घण्टा लटका हुआ है। मंदिर में अंदर एक बहुत बड़ा कुंड है।

मान्यता है कि मां की आराधना सर्वसिद्धि दायक व मनो कामनाओं की पूर्ति करने वाली है। यहां कश्मीर से कन्या कुमारी तक के श्रद्धालु माता के चरणों में आ कर शीश झुकाते हैं और अपनी मनोकामना की पूर्ति करते हैं।

मां सीता की कुल देवी हैं छोटी देवकाली...

माता सीता के साथ अयोध्या आ गई थीं जनकपुर की कुलदेवी
भगवान श्रीराम की पवित्र नगरी अयोध्या में छोटी देवकाली मंदिर में नगर देवी सर्वमंगला पार्वती माता गौरी के रूप में विराजमान हैं। श्री देवकाली मंदिर में माता सीता की कुल देवी के रूप में इस शक्ति पीठ में विशेष आस्था और श्रद्धा के साथ पूजा जाता है। विश्व में श्रेष्ठ तीर्थस्थलों में रामनगरी अयोध्या प्रमुख है। श्री देवकाली मंदिर स्थान का ऐसी मान्यता है कि मां सीता जब जनकपुरी से अपने ससुराल अयोध्या के लिए चलीं थी तो अपनी कुल देवी माता पार्वती की प्रतिमा साथ ले आई थीं। कथाओं के अनुसार ऐसा उन्होंने अपनी कुलदेवी के कहने पर ही किया था। इसकी जानकारी होने पर महाराज दशरथ ने अयोध्या स्थित सप्तसागर के ईशानकोण पर श्री पार्वती जी का मंदिर बनवा दिया जिसमें माता सीता तथा अन्य रानियां पूजन हेतु जाया करती थीं।

हूणों और मुगलों के आक्रमण से मंदिर दो बार ध्वस्त हुआ
आज यह रामायण कालीन मंदिर अपनी भव्यता और श्रेष्ठता के चलते भारत का प्रमुख देवस्थल बना हुआ है। हूणों और मुगलों के आक्रमण से यह मंदिर दो बार ध्वस्त हुआ। पहली बार इसका पुनर्निर्माण महाराज पुष्यमित्र ने और दूसरी बार बिन्दु सम्प्रदाय के महंत ने इस भव्य मंदिर के स्थान पर एक छोटी सी कोठरी का निर्माण कराया। रूद्रयामल और स्कन्दपुराण में भी श्री देवकाली माता और उनके मंदिर का उल्लेख मिलता है, जिससे इस ऐतिहासिक मंदिर की पौराणिकता प्रमाणित होती है। वहीं, चीनी यात्री ह्वेनसांग व फाहियान ने भी अपने यात्रा में इस मंदिर की प्रतिष्ठा, अति वैभव और विशेषता का उल्लेख किया है।


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